द्वन्द्व युद्ध
XVI
शहर को सिर्फ एक ही रास्ता जाता था – रेल-पथ से होकर,
जो इस स्थान पर अचानक एक गहरे गढ़े से होकर गुज़रता था. रोमाशोव संकरी, बढ़िया समतल,
लगभग खड़ी पगडंडी से फुर्ती से नीचे दौड़ा और कठिनाई से दूसरी ओर की चढ़ाई चढ़ने लगा.
चढ़ाव के बीच से ही उसने ग़ौर किया कोई बंद गले का कोट पहने और कंधे पर ओवरकोट डाले
खड़ा है. कुछ सेकंड ठहर कर आँखें सिकोड़ कर देखने के बाद उसने निकोलाएव को पहचाना.
अब सबसे अप्रिय
बात होने वाली है, रोमाशोव ने सोचा. ख़तरे की आशंका से उसके दिल में पीड़ा होने
लगी. मगर फिर भी वह नम्रतापूर्वक ऊपर चढ़ा. दोनों अफ़सरों ने पाँच दिनों से एक दूसरे को देखा नहीं था,
मगर न जाने क्यों इस समय मिलने पर उन्होंने एक दूसरे का अभिवादन नहीं किया, और न
जाने क्यों रोमाशोव को इसमें कोई असाधारण बात नज़र नहीं आई, जैसे कि इस बदनसीब,
भारी दिन कोई और बात हो ही नहीं सकती थी. उनमें से किसी ने भी अपनी कैप तक हाथ भी
नहीं उठाया.
“मैं जानबूझकर यहाँ
आपका इंतज़ार कर रहा था, यूरी अलेक्सेयेविच,” निकोलाएव ने
रोमाशोव के कंधे से परे दूर कहीं छावनी की ओर देखते हुए कहा.
“आपकी ख़िदमत में
हाज़िर हूँ, व्लादीमिर एफ़िमीच,” रोमाशोव ने झूठी बेतकल्लुफ़ी से, मगर कंपकंपाती आवाज़ में
कहा. वह झुका, पिछले साल की सूखी हुई भूरी घास का डंठल तोड़ा और उसे यूँ ही चबाने
लगा. साथ ही वह ध्यानपूर्वक देख रहा था कि निकोलाएव के कोट की बटनों में कैसे उसकी
आकृति परावर्तित हो रही है: छोटा सा संकरा सिर और पतली पतली टाँगें, मगर किनारों
पर बड़े भौंडेपन से फूली हुई.
“मैं आपको रोकूँगा नहीं, मुझे सिर्फ दो लब्ज़ कहना है,” निकोलाएव ने कहा.
वह बड़ी नर्मी से, स्वयँ पर सँयम रखने का
निर्णय कर चुके, मगर तैश में भड़के और ग़ुस्साए हुए आदमी की प्रयत्नपूर्वक ओढ़ी गई
सौजन्यता से शब्दों का उच्चारण कर रहा था. मगर चूँकि एक दूसरे की आँखों को टालते
हुए बात करना क्रमशः अधिकाधिक अटपटा होता जा रहा था, अतः रोमाशोव ने प्रश्नार्थक
सुझाव रखा, “तो चलें?”
आने जाने वालों के पैरों द्वारा कुचली गई
लहरिया पगडंडी एक बड़े गन्ने के खेत से होकर गुज़रती थी. दूर शहर के छोटे छोटे सफ़ेद
घर और लाल लाल कबेलुओं की छतें दिखाई दे रही थीं. दोनों अफसर साथ साथ चल रहे थे,
एक दूसरे से दूर हटते हुए और अपने पैरों के नीचे घनी, भरपूर, करकराती हरियाली के
बीच से होते हुए. कुछ देर दोनों ख़ामोश रहे. आख़िरकार पहले निकोलाएव ने ज़ोर से, और
बड़ी मुश्किल से देर तक गहरी साँस लेते हुए कहा, “सबसे पहले मुझे
सवाल पूछना होगा: आप क्या मेरी बीबी, अलेक्सान्द्रा पेत्रोव्ना के प्रति यथोचित
सम्मान प्रदर्शित करते हैं?”
“मैं समझ नहीं पा
रहा हूँ, व्लादीमिर एफ़िमोविच...” रोमाशोव ने प्रतिवाद किया. “मुझे भी, अपनी ओर
से, आपसे पूछना पड़ेगा...”
“माफ़ कीजिए!” निकोलाएव अचानक
गरम हो गया. “एक के बाद एक पूछेंगे, पहले मैं, और बाद में आप. वर्ना हम
कुछ भी न कह पाएँगे. साफ़ साफ और सीधी सीधी बात करेंगे. पहले आप मुझे जवाब दीजिए:
क्या आपको ज़रा भी इस बात में दिलचस्पी है कि उसके बारे क्या क्या कहते हैं, कैसी
कैसी अफ़वाहें फैलाई जा रही हैं? तो, एक लब्ज़ में...शैतान! ...उसकी इज़्ज़्त? नहीं,
नहीं, रुकिए, मेरी बात मत काटिए...क्योंकि, मैं उम्मीद करता हूँ कि आप इस बात से
इनकार नहीं करेंगे कि आपने उसकी ओर से और मेरी ओर से सिवाय अच्छाई के कुछ नहीं पाया
है, और यह कि आपका हमारे घर में एक नज़दीकी, अपने, इन्सान के रूप में स्वागत होता
था.”
रोमाशोव ने भुरभुरी ज़मीन पर पैर रख दिया,
बड़े भद्दे ढँग से लड़खड़ा गया और शर्म से बड़बड़ाया, “यक़ीन कीजिए, मैं
हमेशा आपका और अलेक्सान्द्रा पेत्रोव्ना का आभारी रहूँगा.”
“आह, नहीं, ये बात
बिल्कुल भी नहीं है. मुझे आपकी कृतज्ञता नहीं चाहिए,” निकोलाएव गुस्से
में आ गया, “मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि मेरी बीबी के बारे में
गंदी, झूठी अफ़वाहें फैल रही हैं...और, मतलब, जिसका...” निकोलाएव तेज़ तेज़
साँसें लेने लगा और उसने रूमाल से अपना चेहरा पोंछा. “मतलब, एक लब्ज़
में, यहाँ आप भी उलझे हुए हैं. हम दोनों को – मुझे और उसे – हमें क़रीब क़रीब
रोज़ अजीब अजीब से ओछे, बदमाशीभरे गुमनाम ख़त मिलते हैं. मैं उन्हें आपको दिखाऊँगा
नहीं...मुझे ये घृणास्पद लगता है. और इन ख़तों में ये लिखा होता है,” निकोलाएव एक पल
के लिए लड़खड़ाया, “ओह, शैतानियत! ये लिखा होता है कि आप - अलेक्सान्द्रा पेत्रोव्ना के प्रेमी हैं और
ये...ऊ s s s , कैसी नीचता!...और, वगैरह, वगैरह...कि आप दोनों
हर रोज़ छुप छुप के मिलते हैं और जैसे कि सारी बटालियन को इस बारे में मालूम है.
घृणित!”
उसने गुस्से से दाँत किटकिटाए और थूका.
“मुझे मालूम है,
किसने लिखा है,” धीमे से रोमाशोव ने एक ओर को मुड़ते हुए कहा.
“मालूम है?” निकोलाएव रुक गया और उसने बड़ी बेदर्दी से रोमाशोव को
आस्तीन से पकड़ लिया. ज़ाहिर था कि क्रोध की इस लहर ने अचानक उसके कृत्रिम सब्र का
बाँध तोड़ दिया. उसकी भैंसे जैसी आँखें चौड़ी हो गईं, चेहरे पर खून उतर आया, थरथराते
होठों के कोनों पर गाढ़ा थूक निकल आया. पूरी तरह आगे झुकते हुए और भर्त्सनापूर्वक
अपना चेहरा रोमाशोव के चेहरे के निकट लाते हुए वह तैश में चीखा: “तो आप चुप कैसे रह
सकते हैं, अगर आपको मालूम है तो! आपकी परिस्थिति में हर छोटे से छोटे सज्जन
व्यक्ति का ये कर्तव्य है कि हर तरह के सूअरपन का मुँह बन्द कर दिया जाए. सुन रहे
हैं आप...आर्मी के डॉन जुआन! अगर आप ईमानदार आदमी हैं, न कि कोई...”
रोमाशोव ने फक् चेहरे से नफ़रत से
निकोलाएव की आँखों में देखा. अचानक उसके हाथ और पैर बहुत भारी हो गए, सिर हल्का हो
गया, जैसे एकदम ख़ाली हो, और दिल कहीं नीचे, गहराई में गिर गया और वहाँ पूरे शरीर
को झकझोरते हुए बीमार धड़कन से शोर मचाने लगा.
"मैं आपसे विनती करता हूँ कि कृपया
मुझ पर चिल्लाईये नहीं.” खोखलेपन से शब्दों को खींचते हुए रोमाशोव ने कहा. “शराफत से बात
कीजिए, चिल्लाने की इजाज़त मैं आपको नहीं दूँगा.”
“मैं आप पर बिल्कुल
चिल्ला नहीं रहा हूँ,” अभी भी बदतमीज़ी से मगर आवाज़ नीची करते हुए निकोलाएव ने
प्रतिवाद किया. “मैं आपसे सिर्फ प्रार्थना कर रहा हूँ, हाँलाकि मुझे माँग
करने का हक़ है. हमारे पुराने संबंध मुझे इस बात का अधिकार देते हैं. यदि आप
अलेक्सान्द्रा पेत्रोव्ना के साफ़, निष्कलंक नाम की ज़रा भी इज़्ज़त करते हैं तो आप को
इस ज़ुल्म को रोकना होगा.”
“ठीक है, मैं हर
मुमकिन कोशिश करूँगा,” रुखाई से रोमाशोव ने जवाब दिया.
वह मुड़ा और आगे की ओर चल पड़ा, पगडंडी के
बीचोंबीच. निकोलाएव ने फ़ौरन उसे पकड़ लिया.
“और फिर...बस आप,
कृपया, ग़ुस्सा न होईए...” निकोलाएव ने नर्मी से, परेशानी के भाव से कहा. “जब हमने बात शुरू
कर ही दी है, तो उसे पूरा करना ही बेहतर है – ठीक है ना?”
“अच्छा?” रोमाशोव ने
अर्धप्रश्नात्मक भाव से कहा.
“आपने ख़ुद ही देखा
है कि हम किस सहानुभूति के भाव से आपके साथ पेश आते थे, मतलब, मैं और
अलेक्सान्द्रा पेत्रोव्ना, और अब अगर मैं मजबूर हूँ...आह, हाँ, आप ख़ुद ही समझते
हैं कि इस सड़ियल कस्बे में अफ़वाहों से भयानक और कोई चीज़ नहीं!”
“ ठीक है,” दुख से रोमाशोव
ने जवाब दिया. “अब मैं आपके घर नहीं आया करूँगा. आप यही बात मुझसे कहना
चाहते थे ना? अच्छा, ठीक है. मगर, मैंने भी आपके यहाँ न आने का फ़ैसला कर लिया था.
कुछ दिन पहले मैं सिर्फ़ पाँच मिनट के लिए आया था, अलेक्सान्द्रा पेत्रोव्ना को
उसकी किताब लौटाने, और, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ कि वह आख़िरी बार था.”
“हाँ...तो, ये...” निकोलाएव ने कुछ
अस्पष्ट सा कहा और सकुचाहट से ख़ामोश हो गया.
इसी पल अफसर पगडंडी से राजमार्ग पर मुड़
गए. शहर तक लगभग तीन सौ क़दम की दूरी थी, और चूँकि अब किसी और बात के बारे में कुछ
कहना नहीं था, तो वे एक दूसरे के साथ साथ चलते रहे, चुपचाप, बिना एक दूसरे की ओर
देखे. एक ने भी यह नहीं सोचा कि – या तो ठहर जाए या वापस मुड़ जाए. हर पल परिस्थिति बड़ी
कृत्रिम और तनाव भरी होती जा रही थी.
आख़िरकार शहर के पहले घरों के निकट उन्हें
सामने से आता हुआ कोचवान दिखाई दिया. निकोलाएव ने उसे आवाज़ दी.
“हाँ, तो, ये...” फिर से रोमाशोव
से मुख़ातिब होते हुए उसने अटपटेपन से मिन्न्नत सी की, “तो, फिर मिलेंगे,
यूरी अलेक्सेयेविच.”
उन्होंने एक दूसरे की ओर हाथ नहीं बढ़ाया,
बल्कि सिर्फ अपनी अपनी कैप को हाथ लगाया. मगर जब रोमाशोव ने धूल में दूर जाते हुए
निकोलाएव के सफ़ेद मज़बूत सिर की ओर देखा, तो उसे अचानक ऐसा महसूस हुआ जैसे पूरी
दुनिया ने उसे छोड़ दिया हो और वह नितांत अकेला रह गया हो, जैसे उसके जीवन से अभी
अभी कुछ ऐसा काट कर अलग फेंक दिया गया हो, जो सबसे बड़ा, सबसे महत्वपूर्ण था.
वह धीरे धीरे घर की ओर चल पड़ा. आँगन में
उसे गैनान मिला जो दूर से ही प्रसन्नता से और दोस्ताना अंदाज़ में अपने दाँत दिखा
रहा था. सेकंड लेफ्टिनेंट का कोट उतारते हुए, वह पूरे समय प्रसन्नता से मुस्कुराता
रहा और अपनी आदत के मुताबिक़ अपनी जगह पर नाचते हुए.
“तूने खाना नहीं
खाई?” उसने चिंतायुक्त अपनेपन से पूछा. “भूखा तो नहीं है? अभी भागकर मेस से तेरे लिए खाना लाता हूँ.”
“दोज़ख़ में दफ़ा हो
जा!” रोमाशोव उस पर कर्कशता से चिल्लाया. “दफ़ा हो जा, दफ़ा हो
जा, और मेरे कमरे में आने की हिम्मत न कर. और मेरे बारे में कोई भी पूछे – मैं घर पर नहीं हूँ.
चाहे सम्राट महाशय ही क्यों न आ जाएँ.”
वह बिस्तर पर लेट गया और दाँत गड़ाते हुए
अपना मुँह तकिए में छिपा लिया, उसकी आँखें जल रही थीं, कुछ चुभती हुई चीज़, जो अपनी
नहीं थी, फैलती जा रही थी और उसका गला दबा रही थी, और रोने का मन कर रहा था. वह
बड़े लालच से इन गर्म-गर्म, मीठे आँसुओं की, इन लंबी, कड़वाहट भरी, मन को हल्का करने
वाली सिसकियों की तलाश कर रहा था. और बार बार जानबूझकर बीते हुए दिन को अपनी
कल्पना में साकार कर रहा था, आज की सारी अपमानजनक और लज्जाजनक घटनाओं को इकट्ठा
करते हुए, स्वयँ को मानो जैसे दूर से, एक ओर से देखते हुए, अपमानित, अभागा, कमज़ोर
और परित्यक्त महसूस करते हुए और बड़ी दयनीयता से स्वयँ पर रहम दिखाते हुए. मगर आँसू
नहीं आए.
फिर कुछ अजीब सी बात हुई. रोमाशोव को ऐसा
लगा कि वह ज़रा भी सोया नहीं था, एक भी सेकंड के लिए ऊँघा तक नहीं था, बल्कि सिर्फ
एक पल के लिए बिना कुछ सोचे लेटा था, आँखें बन्द किए. और अचानक उसने स्वयँ को
ताज़ातरीन महसूस किया, आत्मा में पुरानी पीड़ा सहित. मगर कमरे में अंधेरा था. ऐसा
लगता था कि दिमाग़ी कशमकश की इस समझ में न आने वाली स्थिति में पाँच घंटे से कुछ
ज़्यादा समय बीत गया था.
उसे भूख लगी थी. वह उठा, तलवार लटकाई,
कंधों पर ओवरकोट डाला और मेस की ओर चल पड़ा. मेस निकट ही थी, क़रीब दो सौ क़दम की
दूरी पर, और रोमाशोव वहाँ हमेशा सड़क की ओर से नहीं बल्कि पिछले रास्ते से जाया
करता था, किन्हीं ख़ाली मैदानों से, किन्हीं बगीचों से और कुछ बागड़ों को फाँदते
हुए.
डाईनिंग हॉल में, बिलियार्ड रूम में और
किचन में तेज़ रोशनी वाले लैम्प जल रहे थे और इस कारण अफ़सरों की मेस का गंदा,
बेतरतीब चीज़ों से भरा आँगन काला नज़र आ रहा था, जैसे उस पर स्याही उंडेल दी गई हो.
चारों ओर खिड़कियाँ पूरी खुली थीं. बातचीत की, हँसने की आवाज़ें, गाने, बिलियार्ड की
गेंदों की ज़ोर ज़ोर से हो रही खट् खट् सुनाई दे रही थी.
रोमाशोव पिछली ड्योढ़ी में पहुँच गया था
मगर डाईनिंग हॉल में कैप्टेन स्लीवा की गुस्से से थरथराती और व्यंग्यात्मक आवाज़
सुनकर वह अचानक रुक गया. खिड़की दो ही क़दम दूर थी, और, सावधानीपूर्वक उसमें झाँकने
पर रोमाशोव को अपने कम्पनी कमांडर की झुकी हुई पीठ नज़र आई.
“प-पूरी रेजिमेंट
चल रही है, जैसे एक आदमी हो – आत्! आत्! आत्!” – अपनी खुली हुई हथेली को एक लय में ऊपर नीचे करते हुए
स्लीवा कह रहा था, “और वो एक, मानो सबका मख़ौल उड़ाते हुए – ओ! ओ! – याक्, वो बकरा.” उसने परेशानी और
बेतरतीबी से कई बार अपनी उँगली ऊपर की ओर उठाई. मैंने उसे सी-सीधे कह दिया,
बि-बिना किसी प्रस्तावना के: जाईये-गा प-परम आ-आदरणीय महोदय, किसी औ-और रेजिमेंट
में. बेहतर तो यही होगा कि आप बिल्कुल ही चले जाएँ क-कम्पनी से. कैसा अफ़सर बनेगा
आपसे? बस, को-कोई विस्मयबोधक चिह्न...”
रोमाशोव ने अपनी आँखें सिकोड़ीं और ख़ुद भी
सिकुड़ गया. उसे ऐसा लगा कि यदि इस समय वह अपनी जगह से ज़रा भी हिला तो डाईनिंग हॉल
में बैठे हुए सारे लोग उसे देख लेंगे और खिड़कियों से अपने अपने सिर बाहर
निकालेंगे. इसी हालत में वह क़रीब दो मिनट खड़ा रहा. फिर, जितना संभव था, उतने हौले
से साँस लेते हुए, झुक कर और अपने सिर को कंधों में छिपा कर वह पंजों के बल दीवार
से लगे लगे सरक गया, उसे पार करके, अपनी चाल तेज़ करते हुए, फाटक तक पहुँचा और चाँद
की रोशनी से आलोकित सड़क को दौड़ कर पार करके जल्दी से सामने वाली बागड़ की घनी परछाई
में छिप गया.
इस शाम को रोमाशोव काफ़ी देर तक शहर में
भटकता रहा, पूरे समय छायादार किनारों से होते हुए, मगर लगभग ये महसूस न करते हुए
कि वह किन रास्तों से जा रहा है. एक बार वह निकोलाएवों के घर के सामने रुका, जो
चाँद की रोशनी में सफ़ेद झक् नज़र आ रहा था, अपनी हरी टीन की छत समेत ठंडेपन से,
चमकीलेपन से और अजीब तरह से प्रकाशित होते हुए. सड़क, बिना एक भी आदमी के, मुर्दों
जैसी ख़ामोश थी और अपरिचित प्रतीत हो रही थी. घरों की और बागडों की सीधी, स्पष्ट
परछाईयाँ पुल वाली सड़क को स्पष्टत: दो हिस्सों में बाँट रही थीं – आधा हिस्सा
बिल्कुल काला था, और दूसरा ऑईल पेंट की तरह चमक रहा था – चिकने, पत्थर जड़े
फर्श जैसा.
गहरे लाल, मोटे परदों के पीछे एक बड़े
गर्माहट भरे धब्बे की तरह, लैम्प की रोशनी नज़र आ रही थी. “प्यारी, क्या तुम
ज़रा भी महसूस नहीं कर रही हो कि मुझे कितना दुख है, कितनी पीड़ा झेल रहा हूँ मैं,
कितना प्यार करता हूँ मैं तुमसे!” रोनी सूरत बनाते हुए और अपने दोनों हाथों को सीने पर कस कर
दबाते हुए रोमाशोव फुसफुसाया.
अचानक उसके दिमाग में शूरोच्का को मजबूर
करने का ख़याल आया ताकि वह उसे दूर से, कमरे की दीवारों से होते हुए सुने और समझे.
तब, अपनी मुठ्ठियाँ इतनी ज़ोर से भींचकर कि नाख़ूनों के नीचे दर्द होने लगा, अपने जबड़े
थरथराहट से भींचकर और पूरे शरीर में ठंडी चींटियाँ महसूस करते हुए उसने अपनी पूरी
इच्छा शक्ति को इसी बात पर केन्द्रित कर दिया:
“खिड़की में देखो – परदे के पास आओ.
दीवान से उठो और परदे की ओर आओ. बाहर देखो. सुन रही हो, मैं तुम्हें आज्ञा देता
हूँ, फ़ौरन खिड़की के पास आओ.”
परदे निश्चल ही रहे. “तुम मेरी बात सुन
नहीं रही हो!” कड़वाहट भरी भर्त्सना से रोमाशोव फुसफुसाया. “तुम इस समय उसकी
बगल में बैठी हो, लैम्प के पास, शांत, उदासीन, ख़ूबसूरत. आह, मेरे ख़ुदा, ख़ुदा,
कितना बदनसीब हूँ मैं!”
उसने गहरी साँस ली और थके हुए क़दमों से,
सिर काफ़ी नीचे झुकाए आगे बढ़ चला.
वह नज़ान्स्की के क्वार्टर के सामने से भी
गुज़रा, मगर वहाँ अंधेरा था. रोमाशोव को, वाक़ई में, ऐसा महसूस हुआ कि किसी सफ़ेद आकृति
की अंधेरे कमरे में खिड़कियों के सामने झलक दिखाई दे रही है, मगर न जाने क्यों उसे
डर लगा, और वह नज़ान्स्की को आवाज़ देने का निर्णय न कर पाया.
कुछ दिनों बाद रोमाशोव ने, मानो विगत में
देखे हुए अविस्मरणीय सपने के समान, इस चमत्कारिक, लगभग उन्मादयुक्त भ्रमण को याद
किया.
वह स्वयँ भी बता नहीं सकता कि कैसे वह
यहूदियों की कब्रगाह के निकट पहुँचा. वो शहर की सीमा से बाहर स्थित थी और ऊपर
पहाड़ी की ओर फैली थी, चारों ओर नीची सफ़ेद दीवार से घिरी हुई, ख़ामोश और रहस्यमय.
नंगे, एक जैसे, ठंडे पत्थर, जो अपनी एक जैसी पतली पतली परछाईयाँ डाल रहे थे, चमकदार,
सोती हुई घास से दयनीयता से ऊपर की ओर उठ रहे थे. और कब्रगाह पर तनहाई की भव्य
सादगी का ख़ामोश और कठोर साम्राज्य था.
फिर उसने स्वयँ को दूसरे छोर पर देखा. हो
सकता है, यह वाक़ई में सपने में ही हुआ हो? वह लंबे, फैले हुए, चमक रहे चौड़े बांध
के मध्य में खड़ा था, जो बूग पर बना था. उनींदा जल अलसाते और भरभराते हुए उसके
पैरों के नीचे बह रहा था, गुनगुनाते हुए ज़मीन से टकरा रहा था, और चाँद, उसकी चंचल
सतह में एक थरथराते स्तंभ की भांति परावर्तित हो रहा था, और ऐसा लग रहा था कि एक
संकरे रास्ते से अंधेरे, ख़ामोश और निर्जन, दूर वाले किनारे की ओर जाते हुए. ये
करोड़ों चाँदी जैसी मछलियाँ पानी में छप छप कर रही हैं. रोमाशोव को यह भी याद रहा
कि चारों ओर – रास्तों पर और शहर से बाहर – उसके पीछे पीछे
चल रही थी प्रस्फुटित होती हुई सफ़ेद अकासिया की नाज़ुक, छिपी छिपी ख़ुशबू.
इस रात उसके दिमाग़ में अजीब अजीब से
विचार आए – अकेले विचार, कभी दयनीय, कभी डरावने, कभी ओछे, बच्चों जैसे, हास्यास्पद. सबसे
अधिक तो उसे, जैसे एक अनुभवहीन खिलाड़ी के साथ होता है, जो एक ही शाम को अपनी पूरी
जायदाद हार चुका हो, अचानक एक सम्मोहक स्पष्टता से महसूस हो रहा था कि कुछ भी
अप्रिय हुआ ही नहीं था, कि ख़ूबसूरत सेकंड लेफ्टिनेंट रोमाशोव सेरेमोनियल परेड़ में
बड़े शानदार ढंग से जनरल के सामने से गुज़रा, सबकी तारीफ़ें उसने सुनीं और अब वह
स्वयँ अपने साथियों के साथ बिजली की रोशनी से आलोकित ऑफ़िसर्स मेस के डाईनिंग हॉल
में बैठा है और ठहाके लगा रहा है और रेड वाईन पी रहा है. मगर हर बार फ़्योदोरोव्स्की
की गालियों की, रेजिमेंट कमांडर के ज़हरीले शब्दों की, निकोलाएव के साथ हुई बातचीत
की यादों से ये सपने टूट जाते और रोमाशोव फिर से स्वयँ को लांछित, जिसे सुधारा
नहीं जा सकता, और दुर्भाग्यशाली महसूस करता रहा.
एक रहस्यमय, आंतरिक अंतर्दृष्टि उसे उस
जगह ले आई जहाँ वह दिन में निकोलाएव से जुदा हुआ था. इस समय रोमाशोव आत्महत्या के
बारे में सोच रहा था, मगर बिना ठोस निर्णय के और बिना भय के, एक छुपी हुई, प्यारी
सी – आत्मप्रेम की भावना से. उसकी हमेशा की, बेसब्र फ़न्तासी ने इस ख़याल को पूरी
भयंकरता से विभिन्न रंगों की चटकीली तस्वीरों से सजाकर उसके सामने खड़ा कर दिया.
ये गैनान रोमाशोव
के कमरे से उछला. उसका चेहरा भय से विकृत हो गया है. बदरंग, थरथर काँपता, वह
अफ़सरों के डाईनिंग हॉल में भागता है, जो लोगों से खचाखच भरा है. उसके आने से सभी
अनचाहे अपनी अपनी जगहों से उठते हैं. ‘हुज़ूर...सेकंड
लेफ्टिनेंट...ने...अपने आप को गोली मार ली!...’ बड़ी मुश्किल से
गैनान कहता है. एक आम भगदड़. चेहरे फक् पड़ जाते हैं. आँखों में भय दिखाई देता है. ‘किसने गोली मार
ली? कहाँ? कौन से सेकंड लेफ्टिनेंट ने?’ – ‘महाशय, ये तो
रोमाशोव का अर्दली है!’ कोई गैनान को पहचान लेता है. ‘ये उसका चेरेमीस
है.’
सब फ्लैट की ओर
भागते हैं, कुछ लोग बिना टोपियों के. रोमाशोव पलंग पर लेटा है. फर्श पर खून का
डबरा, और उसमें पड़ी है रिवाल्वर स्मिथ और वेसन, सरकारी मुहर वाली...अफ़सरों की भीड़
में से, जो छोटे से कमरे में जमा हो गई थी, बड़ी मुश्किल से सेना का डॉक्टर,
ज़्नोयको, आगे आता है. ‘कनपटी में!’ उसने ख़ामोशी के
बीच हौले से कहा. ‘सब ख़त्म हो गया.’ किसी ने दबी आवाज़
में कहा, ‘महाशय, टोपियाँ तो उतारिए!’ कई लोग सलीब का
निशान बनाते हैं. वेत्किन मेज़ पर चिट्ठी पाता है, जो पेंसिल से दबा दबाकर लिखी गई
थी, और पढ़ता है : ‘सब को माफ करता हूँ, स्वेच्छा से मर रहा
हूँ, ज़िन्दगी इतनी बोझिल और दुखभरी है! मेरी माँ को मेरी मृत्यु के बारे में
सावधानी से बताईए. गिओर्गी रोमाशोव.’ सब एक दूसरे की
ओर देखते हैं, और सभी एक दूसरे की आँखों में एक ही, परेशानी भरी, अनकही बात पढ़ते
हैं : ‘ये हम उसके हत्यारे हैं!’ किमख़ाब की चादर
से ढँका ताबूत आठ अफ़सरों के हाथों में एक लय में हिल रहा है. सारे अफ़सर पीछे पीछे
चल रहे हैं. उनके पीछे – छठी रेजिमेंट. कैप्टेन स्लीवा गंभीरता
से नाक भौंह चढ़ाता है. वेत्किन का भला चेहरा आँसुओं से फूल गया था, मगर इस समय,
सड़क पर, वह स्वयँ पर नियंत्रण रख रहा है. ल्वोव ज़ोर ज़ोर से हिचकियाँ ले लेकर रो
रहा है, अपने दुख को न छिपाते हुए, बग़ैर शर्माए, -प्यारा, भला बच्चा! मातमी मार्च
की आवाज़ें बसंती दिन में गहरी, आहत हिचकियों जैसे प्रतीत हो रही हैं. वहीं कम्पनी
की सारी महिलाएँ और शूरोच्का है. ‘मैंने उसे चूमा
था!’ वह बदहवासी से सोचती है. ‘मैं उसे प्यार
करती थी! मैं उसे रोक सकती थी, बचा सकती थी!’ ‘बहुत देर हो चुकी
है!’ कड़वी मुस्कुराहट से उसके जवाब में रोमाशोव सोचता है.
ताबूत के पीछे चल
रहे अफ़सर धीमे धीमे आपस में बातें कर रहे हैं : ‘ओह, कितना अफ़सोस
है, बेचारे पर! कितना बढ़िया साथी था, कितना ख़ूबसूरत, योग्य अफ़सर था!...हाँ...नहीं
समझ पाए हम उसे!’ मातमी धुन और ज़ोर से हिचकियाँ लेती है : यह – बेथोवन का संगीत
है, ‘हीरो की मौत पर’. और रोमाशोव
ताबूत में लेटा है, निश्चल, ठंडा, होठों पर चिरंतन मुस्कान लिए. उसके सीने पर
बनफ़्शा के फूलों का छोटा सा गुलदस्ता था, - किसी को नहीं मालूम कि ये फूल किसने
रखे थे. उसने सबको माफ कर दिया : शूरोच्का को, स्लीवा को, फ़्योदोरोव्स्की को और
कोर कमांडर को. कोई नहीं रोए उसके लिए. इस तरह के जीवन के लिए वह ज़्यादा ही
साफ़-सुथरा और सुंदर था! उसे वहाँ अच्छा लगेगा!
आँखों से आँसू बह निकले मगर रोमाशोव ने
उन्हें पोंछा नहीं. स्वयँ के बारे में लोगों को रोते देखने की, अन्यायपूर्ण ढंग से
अपमानित किए जाने की कल्पना करना कितना आनन्ददायी था!
अब वह चुकंदर के खेत के किनारे किनारे जा
रहा था. पैरों के नीचे मोटे सिरे सफ़ेद काले धब्बों के रूप में दिखाई दे रहे थे.
चाँद से प्रकाशित खेत का विस्तार मानो रोमाशोव को दबाए जा रहा था. सेकंड
लेफ्टिनेंट एक छोटे से मिट्टी के टीले पर चढ़ गया और रेल की पटरियाँ बिछाते समय
खोदी गई मिट्टी के ढेरों पर ठहर गया.
यह पूरा भाग काली छाया में था, और दूसरे
भाग पर चमकीली निस्तेज रोशनी पड़ रही थी, और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस पर छोटी से
छोटी घास के हर तिनके को भी देखा जा सकता था. मिट्टी के ढेरों की श्रृंखला नीचे की
ओर जा रही थी, जैसे अंधेरी खाई हो; उसके तल में पॉलिश की हुई पटरियाँ क्षीणता से
चमक रही थीं. दूर, ढेरों के पार खेत के बीच नुकीले सिरों वाले सफ़ेद तँबू चमक रहे
थे.
इन ढेरों के ऊपरी भाग से थोड़ा सा नीचे,
मैदान के समांतर एक चौड़ी कगार थी. रोमाशोव उस पर उतरा और घास पर बैठ गया. भूख और
थकान के कारण उसका जी मिचला रहा था और पैरों में कँपकँपाहट और कमज़ोरी महसूस हो रही
थी. बड़ा, ख़ाली मैदान, मिट्टी के ढेरों के नीचे – आधा छाँव में,
आधा रोशनी में, धुँधली पारदर्शी हवा, ओस में भीगी घास, - सब कुछ डूबा था संवेदनापूर्ण,
लुकाछिपी खेलती ख़ामोशी में, जिसके कारण कानों में गूँजता हुआ शोर हो रहा था. बस
कभी कभी शंटिंग करते इंजन स्टेशन पर चिल्ला देते, और इस विचित्र रात की चुप्पी में
उनकी रुक रुक कर आती हुई सीटियाँ सजीव, उत्तेजित और डराती हुई प्रतीत हो रही थीं.
रोमाशोव पीठ के बल लेट गया. सफ़ेद, हल्के
बादल निश्चल खड़े थे, और उनके ऊपर गोल गोल चाँद तेज़ी से फिसल रहा था. ऊपर
ख़ाली-ख़ाली, अजस्त्र और ठंड़ा-ठंड़ा था, और ऐसा लग रहा था कि धरती से आसमान तक सारा
विस्तार चिरंतन भय और चिरंतन पीड़ा से परिपूर्ण है. वहाँ – भगवान है! रोमाशोव ने सोचा,
और अचानक, स्वयँ के प्रति अपमान की दुख की और दयनीयता की एक मासूम हूक से,
आवेगपूर्ण और कटु फुसफुसाहट से कहने लगा, भगवान! तुमने मुझसे मुँह क्यों फेर
लिया? मैं – छोटा हूँ, मैं – कमज़ोर हूँ, मैं – रेत का एक कण
हूँ, मैंने तुम्हारा क्या बुरा किया है, भगवान? तुम तो सब कुछ कर सकते हो, तुम
दयालु हो, तुम सब कुछ देखते हो, - तुम मेरे साथ नाइन्साफ़ी क्यों कर रहे हो, भगवान?
मगर उसे डर लगा, और वह जल्दी से और
भावनावेग से फुसफुसाया, नहीं, नहीं, दयालु, प्यारे, मुझे माफ़ कर दो, माफ़ कर दो!
मैं और शिकायत नहीं करूँगा. और उसने विनम्र, समर्पण की आज्ञाकारिता से आगे
जोड़ा, तुम्हारा जो जी चाहे, मेरे साथ वही करो. मैं हर चीज़ कृतज्ञतापूर्वक
स्वीकार कर लूँगा.
इस तरह से वह बोल रहा था, और इसी समय
उसके मन के सबसे गुप्त स्थानों पर अचानक एक मासूम-शरारत भरा विचार सरसरा गया, कि
उसकी बेसब्र आज्ञाकारिता सब कुछ देखने वाले भगवान को छू लेगी और उसे कुछ नर्म बना
देगी, और तब अचानक चमत्कार हो जाएगा, जिससे आज की पूरी घटनाएँ – बोझिल और अप्रिय – सिर्फ़ बेहूदा
सपना प्रतीत होंगी.
“कहाँ है
तू...तू...तू...?” क्रोध में और बेसब्री से इंजिन चीख़ा.
और दूसरे ने भी नीचे सुर में, लंबा
खींचते हुए और धमकाते हुए उसका साथ दिया, “या – फ – स् –! ”
मिट्टी के ढेरों के उस ओर कोई चीज़ सरसराई
और प्रकाशित ढलान के बिल्कुल छोर पर उसकी झलक दिखाई दी. रोमाशोव ने हौले से सिर
उठाया जिससे कि अच्छी तरह देख सके. कोई भूरी सी, आकारहीन, आदमी से बहुत कम समानता
रखने वाली चीज़ ऊपर से नीचे की ओर उतरी, चाँद के धूमिल प्रकाश में मुश्किल से घास
से अलग होते हुए. बस सिर्फ परछाई की गतिविधियों से और गिरती हुई मिट्टी की हल्की
सी आवाज़ से उसका पीछा करना संभव था.
ये उसने पटरियाँ
पार कीं. शायद – सिपाही है? रोमाशोव के दिमाग में एक परेशान पहेली
कौंध गई. हर हाल में, ये है तो आदमी. मगर इतने डरावनेपन से कोई पागल या शराबी
ही चल सकता है. कौन है ये?
भूरे आदमी ने पटरियाँ पार कीं और छाँव
में घुस गया. अब स्पष्टता से दिखाई दे रहा था कि वह सिपाही है. कुछ देर के लिए
रोमाशोव की दृष्टि से ओझल होते हुए वह धीरे धीरे और फूहड़पन से ऊपर चढ़ा. मगर दो-तीन
मिनट ही बीते होंगे कि छोटे छोटे बालों वाला, बिना टोपी का सिर नीचे से धीरे धीरे
ऊपर आने लगा.
धुंधला प्रकाश सीधा इस आदमी के चेहरे पर
पड़ा, और रोमाशोव ने अपनी अर्ध-रेजिमेंट के बाँए पार्श्व के सिपाही – ख्लेब्निकोव को
पहचान लिया. वह खुला सिर लिए, हाथों में टोपी पकड़े चल रहा था, सामने की ओर गड़ी हुई
निर्जीव दृष्टि से. ऐसा लग रहा था मानो वह किसी पराई, आंतरिक, रहस्यमय शक्ति के वश
में चल रहा है. वह अफ़सर के इतने पास से गुज़रा कि ओवरकोट का पल्ला उसे छू गया. उसकी
आँखों की पुतलियों में चाँद का प्रकाश तीखे धब्बों जैसा परावर्तित हो रहा था.
“ख्लेब्निकोव! तुम?” रोमाशोव ने उसे
आवाज़ दी.
“आह!” सिपाही चीख़ा और
अचानक, रुक कर, डर के मारे एक ही जगह पर खड़े खड़े पूरे का पूरा थरथराने लगा.
रोमाशोव जल्दी से उठा. उसने अपने सामने
एक मुर्दा, ज़ख़्मी चेहरा देखा, कटे हुए, सूजे हुए, लहूलुहान होंठ, नीली पड़ गई तैरती
हुई आँख. रात के अस्थिर प्रकाश में मारपीट के निशान बड़े दुष्टतापूर्ण, अतिभयानक लग
रहे थे. और ख्लेब्निकोव की ओर देखते हुए रोमाशोव ने सोचा, इसी आदमी ने, मेरे
साथ मिलकर, आज पूरी कम्पनी को अपयश दिया है. हम एक जैसे ही अभागे हैं.
“कहाँ जा रहा है, प्यारे? क्या हुआ है तुझे?” रोमाशोव ने प्यार
से पूछा और स्वयँ भी जानते हुए कि क्यों, अपने दोनों हाथ सिपाही के कंधों पर रख
दिए.
ख्लेब्निकोव ने उसकी ओर खोई खोई, जंगली
दृष्टि डाली, मगर फ़ौरन ही मुड़ गया. उसके होंठ कुछ हिले, धीरे धीरे खुले, और उनमें
से संक्षिप्त सी, बेमतब भर्राहट बाहर निकली. रोमाशोव के पेट और सीने में एक
भोंथरा, थरथराता एहसास, बेहोश होने से पहले के एहसास जैसा, मीठी मीठी गुदगुदाहट
जैसा, दुखभरी टीस मारता रहा.
“तुझे मारा? हाँ? औह, बोलो भी. हाँ? बैठो यहाँ, मेरे साथ
बैठो.”
उसने ख्लेब्निकोव की बाँह पकड़ कर उसे
नीचे खींचा. सिपाही किसी फोल्डिंग गुड़िया जैसा, हौलेपन से और आज्ञाकारिता से सेकंड
लेफ्टिनेंट की बगल में गीली घास पर गिर पड़ा.
“तू कहाँ जा रहा
था?” रोमाशोव ने पूछा.
अटपटेपन से बैठे हुए, कृत्रिम ढंग से पैर
पसारे ख्लेब्निकोव ख़ामोश रहा. रोमाशोव देख रहा था कि कैसे उसका सिर धीरे धीरे,
मुश्किल से नज़र आने वाले हिचकोले खाते हुए सीने पर झुक रहा था. सेकंड लेफ्टिनेंट
को दुबारा संक्षिप्त सी, भर्राई हुई आवाज़ सुनाई दी और उसके सीने में भयंकर दयनीयता
सरसराने लगी.
“तू भागना चाहता था? टोपी तो पहन लो. सुनो, ख़्लेब्निकोव, इस
समय मैं तुम्हारा अफ़सर नहीं हूँ, मैं ख़ुद भी – अभागा, अकेला,
मार डाला गया इंसान हूँ. तुझे बर्दाश्त नहीं होता? दर्द हो रहा है? मुझसे खुल कर
बात करो. शायद तुम ख़ुदकुशी करना चाहते थे?” रोमाशोव ने असंगत
फुसफुसाहट से पूछा.
ख्लेब्निकोव के गले में कुछ हिला और कुछ
घरघराया, मगर वह ख़ामोश रहा. साथ ही रोमाशोव ने यह भी देखा कि सिपाही रहरहकर हल्के
से कंपकंपा रहा है: उसका सिर काँप रहा था, उसके जबड़े ख़ामोश किटकिटाहट से काँप रहे
थे. एक सेकंड के लिए ऑफ़िसर को डर लगा. ये बुख़ार जैसी अनिद्रा की रात, अकेलेपन का
एहसास, एकसार, धूमिल, चाँद की मुर्दा रोशनी, पैरों के नीचे मिट्टी के ढेरों की
काली होती हुई गहराई, और उसकी बगल में ख़ामोश, मार के आघात से पगलाया हुआ सिपाही – सब कुछ उसे एक
बेहूदा, पीड़ादायक सपने जैसा प्रतीत हुआ, उन सपनों जैसा जो, निश्चय ही, लोगों को सृष्टि
के सबसे अंतिम दिनों में आएँगे. मगर अचानक गर्माहट भरी, विस्मृत सहानुभूति भरी एक
लहर ने उसकी आत्मा को दबोच लिया. और, अपने, स्वयँ के, दुख को छोटा और बेकार का
महसूस करते हुए, इस प्रताड़ित, दमित व्यक्ति के मुक़ाबले में स्वयँ को बड़ा और
बुद्धिमान समझते हुए उसने प्यार से और कसकर ख़्लेब्निकोव के गले में हाथ डाले, उसे
अपने निकट खींचा और जोश से, पुरज़ोर विश्वास से कहा, “ख़्लेब्निकोव,
तुम्हारी तबियत ख़राब है? और मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा है, प्यारे, मुझे भी अच्छा
नहीं लग रहा है, मेरा यक़ीन करो. जो दुनिया में हो रहा है, वह कुछ भी मेरी समझ में
नहीं आता. सब कुछ – एक जंगली, बेमतलब, क्रूर बकवास है! मगर बर्दाश्त करना
होगा, मेरे प्यारे, बर्दाश्त करना होगा...ये ज़रूरी है.”
नीचे झुके हुए ख्लेब्निकोव का सिर अचानक
रोमाशोव के घुटनों पर गिरा. और सिपाही ने अचानक ऑफ़िसर के पैरों को पकड़ लिया, अपने
चेहरे को उनसे सटाकर, रोकी हुई हिचकियों के कारण गहरी गहरी साँसें लेते हुए और
ऐंठते हुए पूरे शरीर से कंपकंपाने लगा.
“बस, और नहीं...” ख़्लेब्निकोव असंबद्धता से बुदबुदाने लगा, - “नहीं कर सकता,
मालिक, और...ओह, ख़ुदा...मारते हैं, हँसते हैं...बटालियन कमांडर पैसे माँगता है,
स्क्वाड्रन लीडर चिल्लाता है...कहाँ से
लाऊँ? पेट मेरा कट चुका है... बचपन में ही कट गया था...फोडा* है पेट
में मालिक...ओह, ख़ुदा, ख़ुदा!”
रोमाशोव सिर के ऊपर झुक गया जो उसके
घुटनों पर भावविह्वलता से इधर उधर घूम रहा था. उसने गंदे बीमार बदन की गंध सूंघी
और सूंघी बू बिना धुले बालों की और खट्टी खट्टी बू ओवरकोट की जिससे सोते समय बदन
को ढाँकते थे. अफ़सर का दिल लबालब भर गया अंतहीन दुख की भावना से; भय, नासमझी और
गहरी आपराधिक दयनीयता से जो दर्द की सीमा तक उसे दबोचते और सिकोड़ते रहे. और, हौले
से झुकते हुए छोटे छोटे बालों वाले, चुभते हुए, गन्दे सिर की ओर वह मुश्किल से
सुनाई देने वाली आवाज़ में फुसफुसाया, “मेरे भाई!”
ख़्लेब्निकोव ने ऑफ़िसर का हाथ पकड़ लिया,
और रोमाशोव को उस पर गर्म गर्म आँसुओं और ठंडे, चिपचिपे पराए होठों के स्पर्श का
अनुभव हुआ. मगर उसने अपना हाथ नहीं खींचा और सीधे साधे, दिल को छूने वाले,
सांत्वना देने वाले शब्द कहे जो बड़े लोग किसी अपमानित बालक से कहते हैं
फिर वह स्वयँ ख्लेब्निकोव को कैम्प में
ले गया. रेजिमेंट-ड्यूटी पर तैनात अंडर ऑफ़िसर
शापोवालेन्को को बुलाना पड़ा. वह सिर्फ
निचले अंतर्वस्त्र में आया, उबासियाँ लेते हुए, आँखें सिकोड़े और कभी अपनी पीठ, तो
कभी पेट खुजाते हुए.
रोमाशोव
ने उसे फ़ौरन ख्लेब्निकोव को ड्यूटी से हटाने की आज्ञा दी. शापोवालेन्को ने प्रतिकार
करने की कोशिश की, “मगर, हुज़ूर, अभी इसकी बदली करने वाला आया नहीं है!...”
“बोलना नहीं!” रोमाशोव उस पर
चिल्लाया. “कल रेजिमेंट कमांडर से कह देना कि मैंने ये हुक्म दिया
था...तो, तुम कल मेरे पास आओगे?” उसने ख्लेब्निकोव से पूछा, और उसने ख़ामोश, नम्र,
कृतज्ञतापूर्ण नज़र से उसे जवाब दिया.
रोमाशोव घर लौटते हुए धीरे धीरे छावनी की
बगल से चल रहा था. एक तंबू में हो रही खुसुर पुसुर ने उसे थोड़ा ठहरने पर और कान
लगाकर सुनने पर मजबूर कर दिया. दबी दबी, लंबी खिंचती आवाज़ में कोई परीकथा सुना रहा
था.
“तो-तो वो ही शैतान
उस सिपाही के पास अपणे प्रमुख जादूगर को भेजता है. वो जादूगर आता है और केता है, “सिपाई, ओ रे
सिपाई, मैं तुझे खा जाऊँगा!” और सिपाही उसे जवाब देता है, “ना, तू मुझे खा ही
नई सकता, इसलिए कि मैं ख़ुद ही जादुगर हूँ!”
रोमाशोव दुबारा रेल की पटरी के किनारे
वाले मिट्टी के ढेर की ओर गया. बेहूदगी भरी, परेशानी भरी, ज़िन्दगी को न समझने की
भावना उसे सताती रही. ढलान पर रुक कर उसने आँखें ऊपर आसमान की ओरउठाईं. वहाँ पहले
ही की तरह ठंडा विस्तार और अंतहीन डरावनापन था. और स्वयँ के लिए भी लगभग
अप्रत्याशित रूप से, मुट्ठियाँ सिर के ऊपर उठाते हुए और उन्हें हिलाते हुए रोमाशोव
जंगलीपन से चीखा, “तू! बूढ़े धोखेबाज़! अगर तुम कुछ कर सकते हो और हिम्मत रखते
हो तो...तो ये: ऐसा करो कि मैं अभी अपना पैर तोड़ लूँ.” उसने आँखें बन्द
करके सीधे ढलान से नीचे छलाँग लगा दी, दो छलाँगों में पटरियाँ पार कर गया और, बिना
रुके, एक ही साँस में ऊपर चढ़ गया. उसके नथुने फूल रहे थे, सीना ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा
था. मगर दिल में अचानक एक गर्वीला, धृष्ठ और दुष्ट शौर्य भड़क उठा.
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* यहाँ हर्निया से तात्पर्य है.
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