द्वंद्व युद्ध
लेखक
अलेक्सान्द्र कूप्रिन
हिन्दी अनुवाद
आ. चारुमति रामदास
द्वंद्व युद्ध
लेखक -अलेक्सान्द्र कुप्रिन
अनुवाद - आ. चारुमति रामदास
अनुवाद - आ. चारुमति रामदास
I
छठी कम्पनी की दोपहर की कक्षाएँ समाप्त हो
रही थीं, और कनिष्ठ अफ़सर बार-बार बेसब्री से अपनी अपनी घड़ी की ओर देख लेते थे.नई
रेजिमेंट के अफ़सरों को गारद की ड्यूटी के बारे में बतलाया जा रहा था. विस्तीर्ण परेड ग्राउंड पर फ़ौजी अलग अलग गुटों में बिखरे थे: रास्ते के
किनारे किनारे लगे पोप्लर वृक्षों के नीचे, जिम्नास्टिक्स की मशीनों के निकट,
कम्पनी के स्कूल के दरवाज़ों के पास, यहाँ वहाँ पड़े विभिन्न उपकरणों के क़रीब. यह सब
कुछ ड्रिल के दौरान गारद की काल्पनिक महत्वपूर्ण इमारतों को प्रस्तुत करता था,
जैसे कि गोला बारूद के स्टोर के निकट की पोस्ट, प्रशासनिक भवन के निकट की पोस्ट,
सुरक्षा चौकी के निकट वाली पोस्ट, कोषागार के निकट वाली पोस्ट. इनके बीच में
संतरियों को रखा और हटाया जा रहा था; ड्यूटी बदली जा रही थी; अंडर ऑफ़िसर्स इन
चौकियों का निरीक्षण कर रहे थे और ड्यूटी पर तैनात इन संतरियों की परीक्षा ले रहे
थे : कभी वे चालाकी से उसकी राइफ़ल छीनने की कोशिश करते, कभी उसे अपनी चौकी छोड़ने
पर मजबूर करते, कभी उसके हाथ में कोई चीज़ पकड़ा देते- अक्सर अपनी कैप. अनुभवी
सिपाही, जिन्हें क़ायदे-क़ानून का भली भाँति ज्ञान था, इनकी शरारतों के झाँसे में न
आते, और गंभीरता से जवाब देते: “दूर हटो! जब तक ख़ुद सम्राट का आदेश प्राप्त नहीं होता, मुझे किसी को भी
अपनी राइफ़ल देने का अधिकार नहीं है.” मगर नौजवान गड़बड़ा जाते. अभी उन्हें अपनी
ड्यूटी के वास्तविक कर्तव्यों और अफ़सरों की मज़ाकिया शरारतों के बीच के फ़रक़ को
समझना नहीं आया था, और इसलिये वे अक्सर किसी न किसी मुसीबत में फँस जाते.
“ख़्लेब्निकोव! टेढ़े
शैतान!” छोटे क़द वाला, गोल मटोल, फुर्तीला लान्स
कोर्पोरल शापोवालेन्का हुक़ूमत भरी चिड़चिड़ाहट से चीख़ा: “ मैं तुझे सिखा-सिखा
के थक गया, बेवक़ूफ़! तूने अभी कौन से ऑर्डर की तामील की है? क़ैदी वाले? तुझे
तो!...जवाब दे, तुझे कौन सी ड्यूटी पर रखा गया है?”
तीसरी प्लेटून में
कुछ गड़बड़ हुई. नौजवान तातार सिपाही मुहम्मदजिनोव, जो बड़ी मुश्किल से थोड़ी बहुत
रूसी बोल एवम् समझ सकता था, अपने अफ़सर के काल्पनिक तथा वास्तविक परिस्थितियों से
संबंधित सवालों से और उसके तानों से पूरी
तरह टूट गया.उसने तैश में आकर अपनी राइफ़ल हाथ में ले ली और संगीन दिखाते हुए सभी
सवालों के जवाब में एक ही निर्णयात्मक जवाब दिया:
“ भोंक दूँगा!”
“ठहर....ठहर जा,
बेवक़ूफ़...” अंडर ऑफ़िसर बोबीलेव
उसे मनाते हुए रोकने लगा, “मुझे नहीं पहचानता? मैं हूँ तेरा
कप्तान...”
“भोंक दूँगा!” जो भी उसके नज़दीक
आने की कोशिश करता उनसे तातार ग़ुस्से में और डर से कह रहा था. उसकी आँखों में ख़ून उतर
आया था. उसके चारों ओर सिपाहियों का झुंड इकट्ठा हो गया, जो इस बात से बड़े ख़ुश हो
रहे थे कि उकताने वाली पढ़ाई में मनोरंजन और फ़ुरसत के कुछ पल तो मिले.
कम्पनी का कमांडर,
कप्तान स्लीवा, यह जानने के लिए पहुँच गया कि मामला क्या है. जब तक वह अपनी झुकी
हुई कमर और घिसटते हुए पैरों से मरियल अंदाज़ में मैदान के दूसरे छोर तक पहुँचा,
कनिष्ठ अफ़सर गपशप लगाने और सिगरेट पीने के लिए इकट्ठा हो गए. वे तीन थे:
लेफ़्टिनेंट व्यात्किन- तैंतीस साल का गंजा, मुच्छड़, ज़िन्दादिल, बातूनी, गायक और
शराबी; सेकण्ड लेफ्टिनेंट रोमाशोव, जो सिर्फ़ दो साल पहले ही रेजिमेंट में आया था; और
अंडर एंसाइन(ध्वज वाहक) ल्बोव-ज़िन्दादिल, ख़ूबसूरत क़द काठी वाला, आँखों में प्यारी
सी शरारत और मासूमियत का भाव, और मोटे होंठों पर सदाबहार मुस्कुराहट. उसके पास
पुराने अफ़सरों के चुटकुलों का मानों भंडार था.
“सुअरपन है!” वेत्किन ने अपनी दचकी हुई घड़ी को देखते
हुए उसके डायल पर ग़ुस्से से टकटक करते हुए कहा, “किस शैतान की बला से वह अभी तक कम्पनी को
रोके हुए है? इथोपियन कहीं का!”
“आप को उसे समझाना
चाहिए, पावेल पाव्लीच,” चेहरे पर चालाकी का भाव लाते हुए ल्बोव
ने उसे सलाह दी.
“ ओह, शैतान तुझे ले
जाये! जाओ, जाकर ख़ुद ही समझा दो. ख़ास बात- क्या है? ख़ास बात ये है कि यह सब बेकार
है. हर बार इंस्पेक्शन से पहले वे जोश में आ जाते हैं. हमेशा इसी तरह ज़्यादती करते
हैं. जवान को सताते हैं, उसे धमकाते हैं, और फिर इन्स्पेक्शन के दौरान जवान बस बेवकूफ़
की तरह खड़ा रहता है. वह मशहूर क़िस्सा तो आपको मालूम ही होग, कि कैसे दो कम्पनी
कमांडरों ने शर्त लगाई कि किसका जवान ज़्यादा खा सकता है? उन्होंने बड़े भारी खवैयों
को चुना. शर्त लगी थी क़रीब-क़रीब सौ रुबल्स की. एक जवान ब्रेड के सात लोफ़ खा गया और
गिर पड़ा, यह कहते हुए कि और नहीं खा सकता. कमांडर ने गुस्से से लाल पीले होते हुए
अपने सार्जेंट मेजर से पूछा कि उसने इस नमूने को क्यों चुना: “कैसे अहमक़ हो तुम, इस
मरियल को भेजकर...मेरी बेइज़्ज़ती करा दी...इतना बड़ा नुक्सान करवा दिया?”
सार्जेंट-मेजर ने कहा
कुछ नहीं, बस आँखें झपकाता रहा: “समझ में नहीं आ रहा, जनाब, कि उसे क्या
हो गया. सुबह तो रिहर्सल की थी- एक ही बार में आठ लोफ खा गया था...” वैसे ही हमारे अफ़सर
भी हैं...रिहर्सल तो हम बड़ी क्रूरता से और बेवजह करवाते हैं, मगर इन्स्पेक्शन के
समय चिंता और थकान से चूर जवान पस्त होकर गिर पड़ता है.”
“कल,” ल्बोव ने अचानक हँसी
से लोटपोट होते हुए कहा, “कल, जब सभी कम्पनियों में ड्रिल ख़तम हो
गई तो मैं अपने फ्लैट की ओर चल पड़ा, आठ बज चुके थे, बिल्कुल अंधेरा हो चुका था.
देखता क्या हूँ कि ग्यारहवीं कम्पनी में सिग्नल्स पढ़ाये जा रहे हैं. कोरस में. “ उ-ठा-ओ, सी-ने तक,
नी-चे-ला-ओ!” मैंने लेफ्टिनेंट
अन्द्रुसेविच से पूछा: “ तुम्हारे यहाँ अब तक यह संगीत क्यों चल
रहा है?” और वह बोला: “ ये, हम, कुत्तों के
जैसे, चान्द को देखते हुए बिसूर रहे हैं.”
“ इस सबसे अब पूरी तरह
उकता गया हूँ,”
वेत्किन
ने उबासी लेते हुए कहा. “ठहरो, देखो तो घोड़े पर यह कौन जा रहा
है? शायद, बेग है?”
“ हाँ. बेग अगामालोव,” तेज़ नज़र वाले ल्बोव
ने कहा. “ कितनी शान से बैठा
है.”
” बेहद ख़ूबसूरत,” रोमाशोव ने सहमति
जताई. “ मेरी राय में वह
हमारे किसी भी घुड़सवार से बढ़िया है. ओ-ओ-ओ! देखो तो, उसका घोड़ा नाच रहा है. शान
दिखा रहा है बेग.”
रास्ते पर एक अफ़सर
धीरे धीरे अपने घोड़े पर जा रहा था. उसने एडजुटेंट वाली युनिफ़ॉर्म पहनी थी और हाथों
में सफ़ेद दस्ताने थे. उसका घोड़ा ऊँचा, लम्बा, सुनहरे बालों वाला था; पूँछ,
अंग्रेज़ी ढंग की, छोटी थी. घोडा गर्म हो रहा था, बेसब्री से अपनी गर्दन हिला रहा
था और अपने पतले पतले पैरों को ठुमकाते हुए चल रहा था.
“पावेल पाव्लीच, क्या
यह सच है कि वह जन्म से चेर्केस है?” रोमाशोव ने वेत्किन से पूछा.
” मेरा ख़याल है कि ऐसा
ही है. कभी कभी वाक़ई में आर्मेनियाई अपने आप को चेर्केस या लेज़्गिन बताते है, मगर
बेग, शायद, झूठ नहीं बोलता. ज़रा ग़ौर फ़रमाइये, घोड़े पर कितना शानदार लग रहा है!”
” रुको, मैं उसे
बुलाता हूँ,” ल्बोव ने कहा.
उसने मुँह के पास हाथ
रखा और दबी हुई आवाज़ में चिल्लाया ताकि कम्पनी कमांडर न सुन ले:
”लेफ्टिनेंट अगामालोव!
बेग!”
घुड़सवार अफ़सर ने लगाम खींची, एक क्षण के लिये
रुका और दाहिने घूम गया. फिर उस दिशा में घोड़े को मोड़ कर हौले से सामने की ओर
झुका, और घोड़े को लचीली गति से खाई पार करवा कर सरपट अफ़सरों की ओर आया.
वह मझोले क़द का,
सूखा-सट, हट्टा-कट्टा और ताक़तवर था. कुछ गंजाते सिर के कारण बड़ा हो चुका माथा,
तोते जैसी नाक, किसी निश्चय को दर्शाते सशक्त होंठ. उसका चेहरा मर्दाना एवम्
ख़ूबसूरत था और अभी तक साँवलेपन और निष्प्रभ पूरबी पीलेपन को सहेजे हुए था.
“नमस्ते, बेग,” वेत्किन ने कहा. “तुम किसे देखकर इतना
अकड़ रहे थे? क्या लड़कियाँ थीं?”
बेग अगामालोव ने सहजता
से काठी से नीचे झुकते हुए अफ़सरों से हाथ मिलाया.वह मुस्कुराया और ऐसा प्रतीत हुआ
मानो उसके चमकीले, क़तारबद्ध, सफ़ेद दाँतों ने चेहरे के निचले भाग और घनी, काली, छोटी-छोटी
मूँछों पर अपनी चमक बिखेर दी हो...
“दो ख़ूबसूरत यहूदी लड़कियाँ वहाँ से गुज़र
तो रही थीं. मगर मुझे इससे क्या? मैंने उनकी ओर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया.”
“मालूम है, मालूम है, कैसे तुम लड़कियों
पर डोरे डालते हो!” वेत्किन ने छेड़ते
हुए कहा.
“सुनो, सुनो, साथियों,” ल्बोव ने कहना शुरू
किया और वह पहले ही हँस पड़ा. “आपको मालूम है कि जनरल दोक्तूरोव ने
इन्फेंट्री के अड्जुटेंट्स के बारे में क्या कहा है? बेग, इससे तुम्हारा ताल्लुक
है. ये कहा है कि वे पूरी दुनिया के सबसे ख़तरनाक घुड़सवारों में से हैं...”
“उल्लू मत बनाओ!” बेग अगामालोव ने
कहा.
उसने घोड़े को धक्का
दिया और ऐसा दिखाया मानो वह सेकंड लेफ़्टिनेन्ट पर चढ़ने वाला हो.
“ या ख़ुदा! सच कह रहा हूँ. कहता है कि
उनके घोड़े मानो घोड़े नहीं बल्कि कोई गिटार हो, कोई हवा का झोंका हो- लंगड़ाते से,
तिरछी आँखों वाले, पिये हुए से. मगर उन्हें हुक्म दो, और वे तूफ़ान की तरह भागते
हैं., जिधर नज़र समाए वहीं. चाहे फेंसिंग हो, या खाई हो... झाड़ियों को फाँद जाते
हैं. लगाम छूटी, ज़रा सी भी हरकत की, तो कैप की हालत ख़राब...यह उड़ी, वह उड़ी! ख़तरनाक
सवार!”
“क्या ख़बर है, बेग?” वेत्किन ने पूछा.
“ख़बर क्या है? नया कुछ
भी नहीं. हाँ, अभी अभी, कुछ देर पहले, रेजिमेन्ट के कमान्डर मेस में लेफ्टिनेन्ट
कर्नल लेख से मिले. इतनी ज़ोर से उन पर चीख़े कि बाज़ार तक सुनाई दे रहा था. और, लेख,
नशे में धुत, साँप की तरह, कुछ कहने की हालत में भी नहीं था. एक जगह खड़ा होकर झूम
रहा था, हाथ पीछे पीठ पर रखे. और शुल्गोविच उस पर गरजा, “जब रेजिमेंट के
कमान्डर से बात कर रहे हो, तो हाथ पीछे मत रखो!”. सारे अर्दली भी
वहीं खड़े-खड़े देख रहे थे.
” आह! बड़ी ख़तरनाक बात
है!” वेत्किन ने कुछ
व्यंग्य से, कुछ उकसाते से अंदाज़ में हँसते हुए कहा, “सुना है कि कल वह
चौथी कम्पनी में दहाड़ा था, ‘तुम मेरी नाक में क़ायदे-क़ानून घुसेड़ रहे हो? मैं-
तुम्हारे लिये क़ायदे-क़ानून सभी कुछ हूँ, ज़बान से एक भी लफ़्ज़ नहीं! मैं यहाँ ज़ार भी
हूँ और ख़ुदा भी!’ ”
ल्बोव अपने ही ख़यालों
पर फिर से हँस पड़ा.
“और सुनो, साथियों, एन.कम्पनी में
एड्जुटेन्ट के साथ जो किस्सा हुआ...”
”ख़ामोश, ल्बोव,” वेत्किन ने संजीदगी
से उसे टोकते हुए कहा, “ये आज तुम इतने बहक क्यों रहे हो?”
“एक और ख़बर भी है,” बेग अगामालोव ने आगे
कहा. उसने दुबारा घोड़े का मुँह ल्बोव की ओर मोड़ा और, मज़ाक में, उस पर घोड़ा चढ़ाने
लगा. घोड़ा ज़ोर ज़ोर से सिर हिलाते हुए हिनहिनाने लगा, उसके मुँह से झाग निकलने लगा.
“ एक और भी ख़बर है. हर
कम्पनी का कमान्डर चाहता है कि अफ़सर किसी पुतले पर तलवार चलाने की प्रैक्टिस करे.
नौंवी कम्पनी ने उसने इतना क़हर ढाया कि पूछो मत. एपिफ़ानोव को क़ैद करवा दिया,
क्योंकि उसकी तलवार की धार तेज़ नहीं थी...तुम क्यों घबरा रहे हो, ल्बोव!” अचानक बेग अगामालोव
सेकन्ड लेफ़्टिनेन्ट पर चीख़ा, “ आदत डालो. ख़ुद भी कभी लेफ़्टिनेन्ट
बनोगे. घोड़े पर ऐसे बैठोगे जैसे तश्तरी में फ़्राइड चिड़िया रखी हो.”
“तू, एशियाई
शैतान!...चल, अपना गंदा थोबड़ा दूर हटा,” ल्बोव ने घोड़े के
मुँह के सामने हाथ नचाते हुए कहा. “तुमने सुना, बेग, कैसे एन. कम्पनी के एक
लेफ्टिनेन्ट ने सर्कस से घोड़ा ख़रीदा? उस पर बैठ कर इन्स्पेक्शन के लिए निकला, और
घोड़ा अचानक फ़ौजों के कमान्डर के सामने स्पेनिश डाँस करने लगा. ऐसे: पैर ऊपर और हवा
में दोनों पैर मिलाते हुए. आख़िरकार घोड़ा और सवार दोनों कम्पनी के सिरे पर पहुँच
गये- हल्ला-गुल्ला, शोर, गड़बड़. और घोड़ा- उसका तो किसी ओर ध्यान ही नहीं-बस अपनी
स्पेनिश चाल से चला जा रहा था. तब द्रागोमीरोव ने फरमान छोड़ा, “लेफ्टिनेन्ट, इसी चाल
से गार्ड रूम जाओ, इक्कीस दिन के लिए, मा-र्च.!”
“ ऐह, बकवास,” वेत्किन ने नाक भौंह
चढ़ाते हुए कहा. “सुनो, बेग, इस
तलवारबाज़ी वाली ख़बर से तो तुमने हमें चौंका ही दिया. इसका क्या मतलब है? हमारे पास
ज़रा भी खाली वक़्त नहीं बचेगा? हमारे लिये भी कल इस राक्षस को लाये हैं.”
उसने ग्राउन्ड की ओर
इशारा करते हुए कहा, जहाँ बीचोंबीच आदमी की शक्ल का मिट्टी का पुतला खड़ा था, बस,
उसके हाथ-पैर नहीं थे.
“ फिर तुमने क्या
किया? तलवार चलाई उस पर?” बेग-अगामालोव ने उत्सुकता से पूछा. “रोमाशोव तुमने कोशिश
की?”
“अभी नहीं.”
“और लो! मैं यह बेकार का काम करूँगा,” वेत्किन भुनभुनाया. “मेरे पास तलवारबाज़ी
करने के लिये वक़्त ही कहाँ है? सुबह नौ बजे से शाम के छ्ह बजे तक , तुम्हें मालूम
ही है, यहीं डोलते रहो. मुश्किल से खाने का और पीने का टाइम मिलता है. शुक्र है
ख़ुदा का कि मैं छोटा बच्चा नहीं हूँ, जो उनकी हर बात सुनता रहे...”
“अजब चीज़ हो. मगर अफ़सर को तलवार चलाना तो
आना चाहिए, ना.”
“मैं पूछता हूँ, आख़िर क्यों? लड़ाई में?
आजकल के गोला-बारूद और पिस्तौलों के होते हुए तुम दुश्मन से सौ क़दम की दूरी तक भी
नहीं पहँच पाते. फिर मुझे तुम्हारी तलवार की क्या ज़रूरत है? मैं कोई घुड़सवार तो
नहीं हूँ. और अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं बन्दूक लेकर फ़ायर करूँगा. यह ज़्यादा ठीक है.”
“चलो, मान लेते हैं. मगर शांति के दिनों
में? कभी भी कुछ भी हो सकता है. उपद्रव, विद्रोह, गड़बड़ी वगैरह...”
“तो क्या? इसमें तलवार का क्या काम? मैं
तो यह कृष्ण-कृत्य करने से रहा, लोगों के सिर काटने का. सीधे अपने फौजियों को
हुक्म दूँगा, फ़ायर!...और, बस, काम ख़त्म...”
बेग अगामालोव के
चेहरे पर अप्रसन्नता का भाव छा गया.
“ऐ, बकवास कर रहे हो, पावेल पाव्लीच.
नहीं, तुम संजीदगी से जवाब दो. समझ लो, तुम कहीं टहल रहे हो, या थियेटर में हो, या
फिर, मान लो, रेस्टारेन्ट में कोई छैला तुम्हारी बेइज़्ज़ती करता है....मानो, अपनी
हद को पार करके कोई सिविलियन तुम्हें झापड़ मारता है, तब तुम क्या करोगे?”
वेत्किन ने अपने कंधे
उचकाए और होठों को नफ़रत से भींच लिया.
“अं! सबसे पहले तो कोई छैला मुझ पर हाथ
ही नहीं उठाएगा, क्योंकि लोग सिर्फ़ उसी को मारते हैं, जो इस बात से डरता है कि उसे
कोई मारेगा. दूसरी बात...मैं ऐसी हालत में क्या करूँगा? रिवाल्वर से उस पर गोली
दागूँगा.”
“और अगर रिवाल्वर घर छूट गया हो, तो?” ल्बोव ने पूछ लिया.
“और, शैतान ले जाए...तो...फिर रिवाल्वर
लाने घर जाऊँगा...क्या बेवक़ूफ़ी है! वह किस्सा याद है न, जब एक कोर्नेट की
म्युज़िक-हॉल में किसी ने बेइज़्ज़ती की थी. वह गाड़ी में बैठ कर घर गया, और अपना
रिवाल्वर लाकर उन दोनों को ढेर कर दिया जिन्होंने उसे अपमानित किया था. बस, हिसाब
बराबर!...”
बेग अगामालोव ने
निराशा से सिर हिलाया.
“जानता हूँ. सुना था इसके बारे में. मगर अदालत
ने फ़ैसला दिया कि उसने पहले से बनाए प्लान के मुताबिक़ ऐसा किया, और उसे दोषी मानकर
सज़ा सुनाई. इसमें अच्छी बात क्या है? नहीं, मैं अपनी बात कहता हूँ, अगर मुझे कोई
मारता है, या मेरी बेइज़्ज़ती करता है...”
उसने अपनी बात पूरी
नहीं की, मगर अपने छोटे से हाथ की मुठ्ठी को, जिसमें उसने घोड़े की लगाम थाम रखी
थी, इतनी ज़ोर से भींच लिया कि उसका हाथ थरथराने लगा. ल्बोव की अचानक हँसी फूट पड़ी.
“तुम फिर से शुरू हो
गए!” वेत्किन ने सख़्ती से
कहा.
“माफ करना, दोस्तों....प्लीज़...हा-हा-हा!
एम. रेजिमेंट में एक किस्सा हुआ था. सेकन्ड लेफ्टिनेन्ट क्राउज़े ने उच्च
अधिकारियों के क्लब में हंगामा खड़ा कर दिया. तब मेनेजर ने उसे कंधे की पट्टियाँ
पकड़कर इतनी ज़ोर से झकझोरा कि वे उखड़ ही गईं. इस पर क्राउज़े ने अपनी रिवाल्वर निकाल
ली- और खोपड़ी के आरपार गोली उतार दी! वहीं! खड़े-खड़े! वहीं एक वकील भी इस झगड़े में
शामिल हो गया, उसका भी वही हश्र किया! ज़ाहिर है, सब भाग गए. इसके बाद क्राउज़े आराम
से चलकर अपने कैम्प में पहँचा, झंडे के पास पहुँचने पर सन्तरी ने ललकारा, “कौन जा रहा है?” “सेकन्ड लेफ्टिनेन्ट
क्राउज़े, झंडे के पास, मरने के लिए!” वह लेट गया और अपने हाथ पर गोली चला
ली. बाद में अदालत ने उसे बरी कर दिया.”
“शाबाश!” बेग अगामालोव ने
कहा.
अफ़सर अपने प्रिय
विषय- बदले की भावना से अचानक की गईं ख़ून ख़राबे की घटनाओं के बारे में बातचीत करने
लगे और इस बात पर भी बहस करने लगे कि कैसे इन घटनाओं के दोषी अक्सर हमेशा बिना सज़ा
पाए छूट गए. एक छोटे से कस्बे में सफ़ाचट मूँछों वाला
कोर्नेट पासोवर (ईस्टर) से लौट रहे यहूदियों के झुंड में बिना किसी बात के तलवार
लेकर घुस गया और मारकाट करने लगा. कीएव में पैदल सेना के सेकंड लेफ्टिनेन्ट ने
डांस-हॉल में एक विद्यार्थी को इसलिए मार डाला क्योंकि उसने उसे कोहनी से धक्का
मारा था. मॉस्को या पीटर्सबुर्ग जैसे एक बड़े शहर में अफ़सर ने सिविलियन को कुत्ते
की तरह गोलियों से दाग़ दिया, क्योंकि उसने रेस्टॉरेन्ट में उस पर यह फ़ब्ती कसी थी
कि शरीफ़ लोग अपरिचित महिलाओं के पास नहीं खड़े होते.”
रोमाशोव ने, जो अब तक
चुपचाप था, बग़ैर किसी ज़रूरत के अपना चष्मा ठीक करते हुए, गला साफ़ किया और लाल होते
हुए बातचीत में कूद पड़ा:
“साथियों, मैं अपनी राय ज़ाहिर करना चाहता
हूँ- रेस्टॉरेन्ट वाले को, मिसाल के तौर पर मैं नहीं गिनता...हाँ. मगर, यदि कोई
सिविलियन हो, तो...कैसे कहूँ?...हाँ...अगर वह शरीफ़ इंसान है, जैसे कि कोई दरबारी
वगैरह...तो मैं उस निहत्थे आदमी पर तलवार से हमला क्यों करूँगा? मैं उसे द्वन्द्व
युद्ध के लिये क्यों नहीं मजबूर कर सकता? आख़िर हम सभ्य इंसान हैं, याने कि...”
“ऐ, बकवास कर रहे हो, रोमाशोव,” वेत्किन ने उसकी बात
काटते हुए कहा. “ तुम उससे द्वन्द्व
युद्ध के लिए कहोगे और वह जवाब देगा, “ न...हीं, जानते हैं, मैं कोई
द्वन्द्व-वन्द्व नहीं मानता. मैं ख़ूनख़राबे के ख़िलाफ़ हूँ...फिर इसके
अलावा...अं..अं.. हमारे यहाँ अदालत भी तो है, ना...” बस, सारी ज़िन्दगी
सिर लटकाए घूमते रहो, कि बदला नहीं ले सके.”
बेग अगामालोव ने अपनी
चमकीली मुस्कान बिखेर दी.
“क्या? अहा! मुझसे
सहमत हो? वेत्किन, मैं तुमसे कहता हूँ: तलवारबाज़ी सीख लो. हमारे यहाँ क़ॉकेशस में
तो सब लोग बचपन से ही सीख जाते हैं. टहनियों के गठ्ठर पर, भेड़ों के कंकाल पर, पानी
पर...”
“और आदमियों पर?” ल्बोव ने पुश्ती
जोड़ी.
“लोगों पर भी,” बड़े इत्मीनान से बेग
अगामालोव ने जवाब दिया. “ और क्या काटते हैं! एक ही वार में आदमी
को सीधे कंधे से नितम्ब तक काट देते हैं, आरपार. यह होता है असली वार! वर्ना तो,
बस अपने हाथ गंदे करते हो.”
“बेग, क्या तुम ऐसा कर सकते हो?”
बेग अगामालोव ने
अफ़सोस से सिर हिला दिया: “ना, नहीं कर सकता...एक छोटी भेड़ के दो
टुकड़े कर सकता हूँ...बछ्ड़े के जिस्म पर भी प्रैक्टिस की थी...मगर आदमी को, माफ़ी
चाहता हूँ, नहीं...नहीं काट सकता. सिर तो धड़ से अलग कर सकता हूँ, मगर सीधे कंधे से
नीचे...नहीं. मेरे अब्बा बड़ी आसानी से कर लेते थे.”
“ चलो, दोस्तों, कोशिश करते हैं,” ल्बोव ने मिन्नत
करते हुए कहा. उसकी आँखें चमक रही थीं. “बेग, प्यारे, चल,
चलते हैं...”
अफ़सर मिट्टी के पुतले
के क़रीब आए. पहला वार वेत्किन ने किया. अपने सीधे-सादे, भोले चेहरे पर जंगली जानवर
जैसा भाव लाकर उसने पूरी ताक़त से, तलवार को नौसिखियों के अंदाज़ में घुमाते हुए
मिट्टी के पुतले पर वार किया. साथे ही, अनचाहे ही, उसके मुँह से आवाज़
निकली-‘ख़्रास!’ जैसी कसाई के मुँह से गाय का मांस काटते समय निकलती है. तलवार की
पाँत मिट्टी में एक चौथाई इंच घुस गई और वेत्किन ने बड़ी मुश्किल से उसे वहाँ से
निकाला!
“ बहुत बुरा!” बेग अगामालोव ने सिर
हिलाते हुए कहा. “ अब तुम आओ,
रोमाशोव...”
रोमाशोव ने म्यान से
तलवार बाहर निकाली और परेशानी से एक हाथ से अपनी ऐनक ठीक की. वह मझोले क़द का,
दुबला-पतला था, और हाँलाकि अपनी कद-काठी के हिसाब से काफ़ी सशक्त था, मगर अत्यंत
संकोचपूर्ण स्वभाव के कारण उसमें सहजता नहीं थी. अकाडेमी में भी जब वह शिक्षा
प्राप्त कर रहा था, वह तलवारबाज़ी में कमज़ोर ही था. नौकरी के डेढ़ साल में तो वह यह
कला पूरी तरह भूल चुका था. तलवार को सिर के ऊपर ले जाते हुए उसने आदतन अपना बायां
हाथ सामने कर लिया.
“हाथ सँभालो!” बेग अगामालोव चीखा.
मगर तब तक देर हो
चुकी थी, तलवार की नोक बस हलके से मिट्टी के पुतले को खुरच ही पाई. मिट्टी के पुतले से प्रतिकार की अपेक्षा करते
हुए रोमाशोव संतुलन खो बैठा और लड़खड़ा गया. तलवार की धार उसके फैले हुए हाथ पर लगी
और तर्जनी के आधार पर चमड़ी का टुकड़ा कट गया. खून का फ़व्वारा निकल पड़ा.
“ओह! देखा!” बेग अगामालोव घोड़े
से उतरते हुए चिड़चिड़ाहट से चहका. “ऐसे तो हाथ जल्दी ही कट जाएगा. क्या
हथियारों से ऐसे पेश आते हैं? चलो, कोई बात नहीं, छोटी सी ज़ख़म है, रूमाल से कस कर
बाँध लो. स्कूली बच्चे! एंसाइन मेरा घोड़ा पकड़ो. देखो. वार का केन्द्र न तो कंधे पर
होना चाहिए और न ही कोहनी पर, बल्कि, यहाँ, कलाई पर होता है.” उसने सीधे हाथ की
कलाई को कई बार गोल गोल घुमाया, और तलवार की पांत उसके सिर के ऊपर एक चमकीला गोल
बनाती रही. “अब देखो: मैं बाँया
हाथ पीछे ले जाता हूँ, पीठ के पीछे. जब तुम वार करते हो, तो लक्ष्य पर न तो मार
करो और न ही उसे धीरे धीरे काटो, बल्कि एक झटके से कलम कर दो, तलवार
को पीछे खींच लो....समझे? यह भी दिमाग़ में बिठा लो: तलवार की सतह मार की दिशा के
अनुरूप होनी चाहिए, एकदम सही-सही. इससे कोना और अधिक तेज़ हो जाता है. देखो.”
बेग अगामालोव मिट्टी
के शैतान से दो क़दम दूर हटा, उसकी ओर एकाग्र, पैनी दृष्टि से देखा और अचानक तलवार
को ऊपर हवा में चमकाते हुए, पलक झपकते ही,
समूचे शरीर को आगे की ओर झोंक कर, वहशत से उस पर टूट पड़ा. रोमाशोव सिर्फ काटी गई
हवा की तीखी सीटी ही सुन सका, और उसी क्षण पुतले का भारी धड़ हौले से ज़मीन पर गिर
पड़ा. जिस जगह पर वार किया गया था, वह इतनी समतल थी, मानो उस पर पॉलिश किया गया हो.
“आह, शैतान! यह है वार!” उत्तेजित ल्बोव
चहका. “बेग, प्यारे, एक बार
और.”
“हाँ, हाँ, बेग, और एक बार, प्लीज़,” वेत्किन ने विनती
की.
मगर बेग अगामालोव ने मुस्कुराते हुए तलवार को
म्यान में वापस रख लिया, जैसे उसे डर था कि कहीं अभी अभी डाला गया प्रभाव नष्ट न
हो जाए. वह गहरी गहरी साँस ले रहा था. खून की प्यासी, विस्फारित आँखें, मुड़ी हुई
नाक और चमकीले दाँत उसे किसी जंगली, दुष्ट और गर्वीले पक्षी जैसा बना रहे थे.
“यह क्या है? क्या इसे
वार कहते हैं?” उसने लापरवाही से
कहा. “ मेरे अब्बू ने,
कॉकेशस में, साठ साल की उमर में घोड़े की गर्दन काटी थी. दो टुकड़े! मेरे बच्चों,
लगातार प्रैक्टिस करनी चाहिए. हमारे यहाँ पता है, क्या करते हैं: वोलो की टहनियों
का गठ्ठर बना कर उस पर प्रैक्टिस करते हैं, या फिर ऊपर से पानी की पतली धार छोड़ कर
उस पर प्रैक्टिस करते हैं. अगर पानी के छींटे नहीं उड़े तो समझ लो कि वार एकदम सही
था. अच्छा, ल्बोव, अब तुम्हारी बारी है.”
वेत्किन के पास भयभीत
अंडर ऑफिसर बोबीलेव दौड़ा आया.
“महानुभाव....रेजिमेन्ट के कमांडर तशरीफ
ला रहे हैं!”
मैदान के दूसरे छोर
से कप्तान स्लीवा की कठोर, उत्तेजित और लंबी कमांड सुनाई दी, “साSSSव-धाSSSSन!”
अफ़सर शीघ्रता से अपनी
अपनी टुकड़ियों की ओर चल पड़े.
एक बड़ी, खुली गाड़ी
धीरे धीरे रास्ते से नीचे उतर कर ग्राउंड पर आई और रुक गई. उसमें से एक ओर से, अपने
शरीर को टेढ़ा करते हुए, बड़ी मुश्किल से रेजिमेन्ट का कमांडर उतरा, और दूसरी ओर से
उतरा उसका ऊँचा, छैला एडजुटेन्ट, स्टाफ़-कैप्टन फ्योदोरोव्स्की.
“हैलो, छ्ठी कम्पनी!” कमान्डर की भारी,
शांत आवाज़ गूँजी.
ग्राउंड के सभी कोनों
से सिपाही ज़ोर से अलग अलग चिल्लाए, “ सलामत रहिए, महाSSSनुभाSSSव!”
अफ़सर टोपियों पर अपने
अपने हाथ ले गए.
“कृपया अपनी ड्रिल जारी रखिए,” कमांडर ने कहा और वह
निकट की प्लैटून के पास गया.
कमांडर शुल्गोविच
बहुत बुरे मूड में था. उसने सभी प्लैटून्स का चक्कर लगाया, सिपाहियों से फौजी
क़ायदे-क़ानूनों के बारे में सवाल पूछता रहा और बीच बीच में बूढ़े फ़ौजियों में इन
परिस्थितियों में पाई जाने वाली बहादुरी और जोश के साथ उन्हें माँ-बहन की गालियाँ
देता रहा, धमकाता रहा. सिपाहियों को उसकी बूढ़ी, बेरंग, कठोर आँखों की एकटक नज़र ने
मानो सम्मोहित कर दिया था, और वे उसकी ओर देखते रहे, बग़ैर पलक झपकाए, मुश्किल से
साँस लेते हुए, डर के मारे पूरे शरीर को काठ जैसा बनाये. बूढ़ा कमांडन्ट भारी भरकम
और खूब मोटा था, मगर था रोबीला. उसका माँसल चेहरा जो गालों की हड्डियों के पास
बहुत चौड़ा था, माथे की ओर जाते जाते सिकुड़ गया था, और नीचे घनी सुनहरी नुकीली दाढ़ी
में परिवर्तित हो गया था. इससे उसका चेहरा एक बड़े भारी समचतुर्भुज जैसा दिखाई देता
था. भँवे घनी,कटीली और डरावनी थीं. बात करते समय वह आवाज़ को, जिसकी बदौलत उसने
अपने कार्यकाल में शीघ्र तरक्की की थी, ज़रा भी ऊँचा नहीं उठाता था. उसकी आवाज़
विशाल ग्राउन्ड के दूर दूर के कोने तक और राजमार्ग पर भी साफ़ साफ़ सुनाई देती थी.
“तू कौन है, बे?” कमांडन्ट ने अचानक
नौजवान सिपाही शरफ़ुद्दीनोव के सामने रुक कर, जो जिम्नास्टिक्स उपकरणों के निकट खड़ा
था, रूखेपन से पूछा.
“छठी कम्पनी का
सिपाही, शरफ़ुद्दीन हूँ, महानुभाव!” तातार बड़ी कोशिश करके भर्राई आवाज़ में
चिल्लाया.
“बेवकूफ़! मैं तुझसे यह
पूछ रहा हूँ कि तू कौन सी ड्यूटी पर है?”
सिपाही कमांडर की चीख़
और उसके ग़ुस्साए चेहरे को देखकर डर गया और कुछ बोल न सका, बस पलकें झपकाता रहा.
“हूँ?” शुल्गोविच ने आवाज़
चढ़ाई.
“सन्तरी की ड्यूटी...इमर्जेन्सी...” तातार ने कुछ
लड़खड़ाते हुए यूँ ही कुछ कह दिया. – समझ में नहीं आ रहा, महानुभाव, “ अचानक सुकूनभरे
निर्णायक ढंग से उसने कह दिया.
कमान्डर के भरे हुए चेहरे पर ईंट के रंग
की गहरी बूढ़ी लाली छा गई, और उसकी कटीली भँवे क्रोध से हिलने लगीं. उसने अपने
चारों ओर घूम कर देखा और तीखी आवाज़ में पूछा:
“यहाँ कनिष्ठ अफ़सर कौन है?”
रोमाशोव ने क़दम आगे बढ़ाया और कैप को छूते
हुए सैल्यूट किया.
‘मैं हूँ, कमान्डर महोदय.”
“आ-आ! सेकन्ड लेफ्टिनेन्ट रोमाशोव. शायद आप
अपने लोगों को अच्छी तरह से ही ट्रेनिंग देते होंगे. घुटने एक साथ!” अचानक अपनी आँखों को गोल गोल घुमाते हुए
शुल्गोविच दहाड़ा. अपने रेजिमेन्ट कमान्डर की उपस्थिति में कैसे खड़े रहते हैं?
कैप्टन स्लीवा, आपको सूचित करता हूँ कि आपका जूनियर अफ़सर अपनी ड्यूटी करते हुए
अपने अधिकारी के सामने ठीक से पेश नहीं होता है...तू...कुत्ते का दिल,” शुल्गोविच शरफुद्दीन की ओर मुड़ा, “तेरी रेजिमेन्ट का कमान्डर कौन है?”
“समझ में नहीं आ रहा,” तातार ने उनींदे ढंग से, मगर
शीघ्रतापूर्वक जवाब दिया.
“ऊ!...मैं तुझसे पूछ रहा हूँ कि तेरी सेना
का कमान्डर कौन है? मैं – कौन हूँ? समझ रहे हो....मैं, मैं, मैं, मैं, मैं!” और शुल्गोविच पूरी ताक़त से अपने सीने पर
मुक्का मारता रहा.
“समझ में नहीं आता...”
“...-........-” कमान्डर ने गड्ड्मड्ड् करके बीस लब्ज़ों
वाला भद्दा जुमला कहा और आगे बोला, “ कैप्टन स्लीवा, इस कुत्ते के पिल्ले को फ़ौरन पूरे हथियारों से लैस करके
मार्चिंग ऑर्डर दो. बदमाश को हथियारों के बोझ से दब जाने दो. और तुम, सेकंड
लेफ्टिनेन्ट, अपनी ड्यूटी के बदले औरतों में ज़्यादा दिलचस्पी लेते हो. वाल्ट्ज़
करते हो? पोल दे कोक पढ़ते हो? ..तुम्हारे ख़्याल में यह क्या है – क्या इसे सिपाही
कहते हैं?” –उसने शरफुद्दीन के होठों में उंगली
गड़ाते हुए कहा. “यह शर्मनाक चीज़ है, बदनुमा दाग़ है, घृणित
वस्तु है, न कि फौज का सिपाही. अपने कमान्डर का नाम तक नहीं जानता...ऊ-ऊ मुझे आप
पर हैरत होती है, सेकंड लेफ्टिनेन्ट!...”
रोमाशोव ने सफ़ेद, लाल, थरथराते चेहरे की
ओर देखा और महसूस किया कि अपमान और व्यग्रता से उसका दिल ज़ोर ज़ोर से थड़थड़ा रहा है
और आँखों के सामने अंधेरा छा रहा है...और
अचानक, स्वयँ के लिये भी अप्रत्याशित रूप से उसने खोखली, सपाट आवाज़ में कहा:
“यह तातार है, कमान्डर महोदय. उसे रूसी ज़रा
भी नहीं आती, और इसके अलावा...
एक पल में शुल्गोविच का चेहरा फक् हो गया,
थुलथुल लटकते गाल थिरकने लगे और आँखें एकदम वीरान और डरावनी हो गईं.
“क्या?!” वह ऐसी कृत्रिम, बहरा करने वाली आवाज़ में
गरजा कि रास्ते के निकट फेंसिंग पर बैठे हुए यहूदी बच्चे पंछियों की तरह विभिन्न
दिशाओं में बिखर गए. “क्या? जवाब देता है? ख़ा-मो-श! दूध पीता एनसाइन हिम्मत करता
है...लेफ्टिनेन्ट फ्योदोरोव्स्की आज के आदेशों में आम सूचना दो कि मैं सेकन्ड
लेफ्टिनेन्ट को सेना के अनुशासन का पालन न करने के जुर्म में चार दिनों के लिये घर
में कैद रखने की सज़ा देता हूँ. और अपने कनिष्ठ अफ़सरों को सेवा से संबंधित नियमों
का ज्ञान न देने के लिए कैप्टेन स्लीवा की कठोर भर्त्सना करता हूँ.”
एड्जुटेंट ने आदर और निडरता से सेल्यूट
किया. स्लीवा झुकी हुई कमर से, भावनारहित, काष्टवत् चेहरा लिये खड़ा था. उसका
थरथराता हुआ हाथ पूरे वक़्त अपनी कैप से जुड़ा रहा.
“शर्म आनी चाहिए आपको, कैप्टन स्लीवा,” शुल्गोविच धीरे धीरे शांत होते हुए कुड़बुड़ाया.
“
आप
रेजिमेंट के बेहतरीन अफ़सरों में से एक हैं, इतने वरिष्ठ हैं- फिर भी अपने नौजवानों
को इस तरह छोड़ देते हैं. उन्हें खींच कर रखिए, बग़ैर किसी हिचकिचाहट के. उनसे
शर्माने की कोई ज़रूरत नहीं हैं. वे कोई महिलाएँ तो नहीं हैं जो पिघल जाएँगी...”
वह फुर्ती से मुड़ा और
एडजुटेंट के साथ अपनी गाड़ी की ओर चला. जब तक वह गाड़ी में बैठा, गाड़ी मुड़ कर
राजमार्ग पर चली गई और रेजिमेंट के स्कूल की इमारत के पीछे छिप न गई, ग्राउँड पर
सहमी सी, दर्दनाक ख़ामोशी छाई रही.
“ओह, ओल्ड मैन!” सूखे से,
गैरदोस्ताना, तिरस्कारयुक्त लहज़े में स्लीवा ने कुछ क्षणों के बाद कहा, जब सारे
अफ़सर अपने अपने घरों की ओर लौट रहे थे. “बहुत शौक चर्रा रहा
था बक बक करने का. चुपचाप खड़े रहते, चाहे ख़ुदा की मार ही क्यों न पड़ती. अब
तुम्हारी वजह से मुझे भी चेतावनी मिली है, पूरी रेजिमेंट के सामने. आख़िर तुम्हें
मेरी ही कम्पनी में क्यों भेजा गया? जैसे मुझे बड़ी ज़रूरत पड़ गई हो तुम्हारी, कुत्ते
की पाँचवी टाँग की तरह. तुम्हें तो अपनी दूध की बोतल चूसनी चाहिए, न कि...”
उसने अपनी बात पूरी
नहीं की, थके हुए अंदाज़ में हाथ झटका और नौजवान अफ़सर के सामने से पीछे मुड़ कर पीठ
झुकाए, सिर लटकाए अपने गंदे, पुराने, कुँवारे घर की ओर घिसटते हुए चला गया.
रोमाशोव उसे जाते हुए देखता रहा, उसकी सुस्त सी, पतली, लम्बी पीठ को देखता रहा और
अचानक उसके दिल में, सहानुभूति उमड़ आई, अभी अभी हुए अपमान और खुल्लम खुल्ला किए गए
शर्मनाक व्यवहार के बावजूद, इस अकेले, कटु हो चुके व्यक्ति के प्रति, जिसे कोई भी
प्यार नहीं करता था, और जिसकी दुनिया में केवल दो चीज़ें बची थीं: अपनी कम्पनी की
शान और हर शाम का, ख़ामोश, अकेला बोतल का नशा जो नींद
से आँखें बोझिल होने तक उसका साथ देता.
और चूँकि रोमाशोव की एक आदत थी, कुछ
हास्यास्पद सी, बचकानी सी, जैसी कि अक्सर नौजवानों में पाई जाती है: स्वयँ को
तृतीय पुरुष में रखकर किसी उपन्यास की तर्ज़ पर अपने आप के बारे में सोचने की, अत:
अभी भी उसने मन ही मन कहा, “उसकी भावना प्रधान, दयालु आँखों में दुख
के बादल तैर गए.”
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