XVIII
मई के बिल्कुल अंत
में कैप्टेन ओसाद्ची की रेजिमेंट में नौजवान सिपाही ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर
ली, और, भाग्य की विचित्रता देखिये, उसने उसी तारीख को फाँसी लगा ली, जब पिछले साल
इस रेजिमेंट में ऐसी ही दुर्घटना हुई थी. जब उसका पोस्ट मॉर्टम किया जा रहा था,
रोमाशोव कम्पनी के ड्यूटी ऑफ़िसर का सहायक था और अनिच्छापूर्वक उसे पोस्टमॉर्टम के
दौरान उपस्थित रहना पड़ा. सिपाही का शरीर अभी सड़ना शुरू नहीं हुआ था. रोमाशोव को
उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए जिस्म से कच्चे माँस की तेज़ बू आई, बिल्कुल वैसी, जैसी
पशुओं के शवों से आती है, जिन्हें माँस की दुकानों के प्रवेश द्वार पर टाँग कर रखा
जाता है. उसने उसके नीले-भूरे चिपचिपाते, चमकते भीतरी हिस्से देखे, उसके पेट में
जमा अन्न को देखा, उसके मस्तिष्क को देखा – भूरा-पीला, पूरी तरह वलयों से
आच्छादित, क़दमों की आहट से मेज़ पर पड़े पड़े थरथराते हुए, जैसे कि जैली, जिसे उलट कर
रख दिया गया हो. ये सब नया था, डरावना था और घिनौना था और साथ ही इसने उसके भीतर
मानव के प्रति एक तिरस्कारयुक्त अनादर को भर दिया.
कम्पनी में, कभी
कभी, बिरले ही, सामूहिक, आम, बदनाम, मद्यपानोत्सव के कुछ दिन आया करते.
शायद यह उन विचित्र क्षणों में होता हो, जब लोग, संयोगवश एक दूसरे से बंधे हुए,
मगर सभी एक साथ उबाऊ निठल्लेपन और बेमतलब क्रूरता की सज़ा पाए, अचानक एक दूसरे को
नज़रों ही नज़रों में समझ गए हों, और वहाँ, दूर, उलझे हुए और पीडित अंतर्मन में ख़ौफ़,
दुख और पागलपन की कोई रहस्यमय चिंगारी सुलग उठी हो. और तब शांत, भरपेट, जैसा कि
साँडों के झुंड में होता है, जीवन, मानो अपनी परिधि से बाहर फिंक जाता है.
ऐसा ही इस
आत्महत्या के बाद भी हुआ. शुरूआत की ओसाद्ची ने. वैसे भी लगातार त्यौहारों के कुछ
दिन गुज़रे थे, और उस दौरान उसने मेस में घोर निराशाजनक खेल खेला और ख़तरनाक रूप से
पीता रहा. अजीब बात थी: इस बड़े, ताक़तवर और जानवरों जैसे हिंस्त्र व्यक्ति की
ज़बर्दस्त इच्छा शक्ति ने पूरी कम्पनी को अपने पीछे घसीट लिया, जैसे नीचे की ओर
जाते हुए मंडराता हुआ कौआ; और इस पतनकारी मद्यपानोत्सव के दौरान ओसाद्ची ने सनकीपन
से, बेशर्म आह्वान से, जैसे कोई सहारा और प्रतिकार ढूँढ रहा हो, अभद्र तरीक़े से
आत्महत्या करने वाले को गाली दी.
शाम के छह बजे थे.
रोमाशोव खिड़की की सिल पर पैर रखे बैठा था और ‘फ़ाऊस्ट’ से वाल्ट्ज़ की धुन पर सीटी
बजा रहा था. बाग में मेगपाई* की टर-टर और चिड़ियों का शोर हो
मेगपाई –
काले-सफ़ेद पंखों और लंबी नुकीली पूँछ वाला पक्षी.
रहा था. शाम अभी
हुई नहीं थी, मगर पेड़ों के बीच में अभी से हल्की, ख़यालों में डूबी परछाईयाँ तैर
रही थीं.
अचानक उसके घर के
फाटक के पास किसी की आवाज़ ज़ोर से, जोश से, मगर बेसुरेपन से गा उठी:
तैश में हैं घोड़े,
खनखनाते हैं दहाने,
फ़ेन उगलते, चले
तीर से, फुत्का-आ-आ-रते...
झनझनाहट के साथ
दोनों प्रवेशद्वार खुल गए और कमरे में टपक पड़ा वेत्किन. मुश्किल से संतुलन बनाए
रखे वह गाता रहा:
मालिक, मालकिनें
नज़रों से बदहवास,
देखते हैं पीछे
जाने वालों को.
वह कल से ही पूरी
तरह नशे में धुत था, एकदम बदहवास. सारी रात न सोने के कारण आँखों की पलकें लाल हो
गईं थीं और फूल गई थीं. टोपी सिर पर पीछे की ओर खिसक गई थी. मूँछे, अभी तक गीली,
काली हो रही थीं और दो घनी, बर्फ की छड़ियों की तरह लटक रही थीं, जैसी वालरस की
होती हैं.
“र-रोमुआल्द! सीरियाई फ़कीर, आओ मैं तुम्हें चूम लूँ!” वह तरन्नुम में पूरे कमरे में चिल्लाया. “अरे, ये तुम सिर लटकाए क्यों बैठे हो?
चलो, भाई. वहाँ चहल-पहल है, खेल रहे हैं, पी रहे हैं. चलेंगे!”
उसने बड़ी देर तक
ज़ोर से रोमाशोव के होठों को चूमा, उसके चेहरे को अपनी मूँछों से गीला करते हुए.
“ओह, बस करो, बस करो, पावेल पाव्लोविच,” रोमाशोव ने क्षीण प्रतिकार किया, “ये बच्चों जैसा जोश किसलिए?”
“दोस्त, तुम्हारा हाथ! इन्स्टिट्यूट के साथी. तुम्हारे भीतर मैं अपनी पिछली
परेशानियों और फुर्र से उड़ चुकी जवानी को प्यार करता हूँ. अभी अभी ओसाद्ची ने ऐसी ‘चिरंतन
याद’ गाई कि शीशे खड़खड़ा उठे. रोमाशोव, भाई, मैं तुमसे प्यार करता हूँ! आओ, मैं
तुम्हें चूम लूँ, सचमुच के तरीक़े से, रूसी तरीक़े से, ठीक होठों को!”
रोमाशोव को
वेत्किन के सूजे, पथराई आँखों वाले चेहरे से नफ़रत हो रही थी, उसके मुँह से आ रही
बदबू से घिन हो रही थी, उसके गीले होठों और मूँछों का स्पर्श भयानक प्रतीत हो रहा
था. मगर वह हमेशा ऐसी परिस्थितियों में असुरक्षित अनुभव करता, और अब, सिर्फ
नाममात्र के लिए अलसाएपन से मुस्कुरा रहा था.
“रुक; मैं तेरे पास आया किसलिए?...” हिचकियाँ लेते हुए और लड़खड़ाते हुए वेत्किन चिल्लाया. “ कोई महत्वपूर्ण बात थी...आ..., तो इसलिए. तो, भाई, मैंने
बोबेतिन्स्की की छुट्टी कर दी. जानते हो – पूरी की पूरी, आख़िरी कोपेक भी नहीं
छोड़ा. बात यहाँ तक पहुँची कि वह प्रामिसरी नोट पर खेलने की विनती करने लगा! तो,
मैं उससे कहता हूँ: ‘नहीं, मेरे बाप, ये तो बड़ी चीज़ है, कोई हल्की सी चीज़ नहीं लगा सकते?’ तब उसने रिवाल्वर रख दिया.
ये-ये-ये रहा, रोमाशेन्को, देखो,” वेत्किन ने पतलून से रिवाल्वर
निकाला, ऐसा करते समय जेब को पूरा उलट दिया, छोटा सा, ख़ूबसूरत रिवाल्वर अपने भूरे
स्वेड के खोल में. “ये, भाई मेरे, मेर्विन सिस्टम का
है. मैं पूछता हूँ: ‘ कितने लगाते हो? – ‘पच्चीस’ – ‘दस!’-‘पन्द्रह’.
‘ओह, शैतान ले जाए!’ उसने एक रुबल
रोशनी में रखा और एक रंग पर रकम लगाई. बात्स, बात्स, बात्स, बात्स! पाँचवी चाल में
मैंने उसकी रानी को – फ़्लैट! नम-अ-स्ते, सौ पॉइंट्स! उस पर कुछ और भी बाकी रहा.
शानदार रिवाल्वर और उसकी गोलियाँ. तेरे लिए, रोमाशेविच. यादगार के तौर पर और
प्यारी दोस्ती के नाम पर ये रिवाल्वर तुझे प्रेज़ेंट करता हूँ, और हमेशा याद करना,
कैसा है वेत्किन – बहादुर अफ़सर. बा! ये तो कविता हो गई.”
“ये क्यों, पावेल पाव्लोविच? छुपा लीजिए.”
“तुम क्या समझते हो, बुरी रिवाल्वर है? हाथी को भी मार सकते हो. रुको, हम अभी
देखते हैं. तेरा गुलाम कहाँ रहता है? मैं जाकर उससे कोई लकड़ी का बोर्ड लाता हूँ.
ऐ, गु-गु-गुलाम! हथियार वाले!”
डगमगाते पैरों से वह ड्योढ़ी में गया, जहाँ अक्सर गैनान रहता था, कुछ देर वहाँ
घूमा और एक मिनट बाद वापस आया, दायीं बगल में पूश्किन के बुत को सिर से पकड़े हुए.
“नहीं, पावेल पाव्लोविच, ये नहीं चलेगा,” रोमाशोव ने क्षीणता से उसे रोका.
“ ऐ, बकवास! कोई फ़ालतू चीज़ है. अभी हम इसे तिपाई पर रखते हैं. चुपचाप खड़े रहो,
बदमाश!” वेत्किन ने उंगली से बुत को धमकाया. “सुन रहे हो?” मैं तुम्हें ए-क दूँगा!”
वह एक ओर को हटा, खिड़की की सिल पर रोमाशोव की बगल में झुका और रिवाल्वर का
घोड़ा ऊपर चढ़ाया. मगर ऐसा करते हुए वह इतने फूहड़पन से हवा में रिवाल्वर घुमाता रहा,
कि डर के मारे रोमाशोव के माथे पर बल पड़ गए, और बदहवास फ़ायर की प्रतीक्षा करते हुए
वह लगातार पलकें झपकाता रहा.
दूरी आठ क़दमों से ज़्यादा नहीं थी. वेत्किन हत्थे को विभिन्न दिशाओं में घुमाते
हुए बड़ी देर तक निशाना साधता रहा. आख़िरकार उसने गोली चलाई और बुत के दाएँ गाल पर,
एक बड़ा सा, आड़ा-तिरछा, काला छेद बन गया. रोमाशोव के कानों में इस शॉट से झनझनाहट
होने लगी.
“देखा, प्यारे?” वेत्किन चिल्लाया. “लो, ये लो, तुम्हारे लिए, याददाश्त के तौर पर रख लो और मेरी मोहब्बत को याद
करो. और अब, अपना कोट पहनो और फुर्र से मेस में. रूसी
हथियारों को इज़्ज़त बख्शें.”
“पावेल पाव्लोविच, वाक़ई में, कोई फ़ायदा नहीं है, वाक़ई में, बेहतर है, न जाना,” क्षीणता से रोमाशोव ने उसे मनाया.
मगर वह इनकार न कर सका: ऐसा करने के लिए उसे निर्णायक शब्द नहीं मिले, न ही
आवाज़ में सख़्ती आ सकी, और अपने चीथड़े जैसे दब्बूपन के लिए मन ही मन अपने आप को
कोसते हुए वह निढ़ाल होकर वेत्किन के पीछे पीछे घिसटता गया, जो डगमगाते क़दमों से ,
आड़े-तिरछे होते हुए, ककड़ियों और बन्द गोभी पर पैर रखते हुए बागों की क्यारियों के
सामने से चल रहा था.
यह बड़ी बेतरतीब, शोर गुल वाली, उत्तेजना भरी – वाक़ई में पागलपन की शाम थी. पहले
तो मेस में पीते रहे, फिर चल पड़े रेल्वे स्टेशन की ओर गरमा गरम ग्लिंटवाईन*
पीने, फिर मेस में वापस लौटे. पहले तो रोमाशोव झिझक रहा था, उसे अपने आप पर, अपने
दब्बूपन पर कोफ़्त हो रही थी और असंतोष तथा अटपटेपन की भावना उस पर हावी होने लगी,
जो हर तरोताज़ा व्यक्ति को पियक्कड़ों के सामने होती है. हँसी उसे कृत्रिम लग रही
थी; ताने – उथले, मरियल; गाने – बेसुरे. मगर गर्म लाल शराब से, जो उसने रेल्वे
स्टेशन पर पी थी, उसका सिर अचानक चकराने लगा और उसमें एक शोर गुल वाली, थरथराती
मस्ती भर गई, आँखों के सामने करोड़ों थरथराते रेत के कणों का भूरा पर्दा खिंच गया,
और सब कुछ आरामदेह, मज़ाहिया हो गया और समझ में आने लगा.
घंटे पर घंटे यूँ बीतते रहे जैसे सेकण्ड्स हों; और सिर्फ इसलिए क्योंकि
डाइनिंग हॉल में लैम्प जला दिए गए, रोमाशोव को एहसास हुआ कि काफ़ी समय बीत चुका है
और रात हो गई है.
“हज़रात, चलें, लड़कियों के पास चलते हैं,” किसी ने सुझाव दिया. “चलो, सब श्लेफेर्षा के पास चलते हैं.”
“ श्लेफेर्षा के पास, श्लेफेर्षा के
पास, हुर्रे!”
और सभी भागदौड़ करने लगे, कुर्सियों की आवाज़ें करने लगे, हँसने लगे. इस शाम को
सब कुछ अपने आप हो रहा था. मेस के दरवाज़े पर दो-दो घोड़ों वाली टमटमें खड़ी हो गईं,
मगर किसी को नहीं पता कि वे आई कहाँ से थीं. रोमाशोव की चेतना में काफ़ी पहले से ही
काला, उनींदा ख़ालीपन आ गया था, जो बीच बीच में विशेष, प्रखर समझ को आने दे रहा था.
उसने अचानक स्वयँ को गाड़ी में वेत्किन की बगल में बैठे देखा. सामने वाली सीट पर था
कोई तीसरा, मगर रात में रोमाशोव किसी भी तरह उसका चेहरा नहीं देख पाया, हाँलाकि वह
अपने शरीर को मरियलपन से दाँये-बाँये हिलाते उसकी ओर झुका भी था.
ये चेहरा काला नज़र आ रहा था, कभी वह मुट्ठी में समा जाता, कभी तिरछी दिशा में
फैल
जाता और काफ़ी परिचित नज़र आता. रोमाशोव अचानक हँस पड़ा, और जैसे उसने बगल से
अपनी ही हँसी सुनी – भोथरी, काठ जैसी.
“झूठ बोल रहे हो, वेत्किन. मुझे मालूम है, भाई, हम कहाँ जा रहे हैं,” उसने नशीली शरारत से कहा. “तुम, भाई, मुझे औरतों के पास ले जा
रहे हो. मैं, भाई, जानता हूँ.”
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ग्लिंटवाईन – मसाले और शक्कर डली हुई गरमा गरम वाईन
कानों को बहरा बनाती, पत्थरों पर खड़खड़ाहट करती एक गाड़ी उनसे आगे निकल गई.
बत्तियों की रोशनी में फुर्ती और बदहवासी से लपकते कुमैत घोड़ों की झलक दिखाई दी;
कोचवान तैश से चाबुक घुमा रहा था, और चीख़ते तथा सीटियाँ बजाते उसमें बैठे चार ऑफ़िसर्स
अपनी अपनी सीट पर हिचकोले खा रहे थे.
एक मिनट के लिए रोमाशोव की चेतना असाधारण प्रखरता और स्पष्टता से लौटी. हाँ,
वह उस जगह जा रहा है जहाँ कई सारी औरतें जो चाहे उसे अपना जिस्म दे देती हैं, अपना
प्यार और अपने प्यार का महान रहस्य दे देती हैं. पैसों के लिए? एक मिनट के लिए?
आह, क्या बात एक ही नहीं है! औरतें! औरतें!” – रोमाशोव के भीतर कोई जंगली और
मीठी, अधीर, बेसब्र आवाज़ चीखी. इसके साथ जुड़ गई एक दूर से आती, मुश्किल से सुनाई
देती ध्वनि; जुड़ गया एक ख़याल शूरोच्का के बारे में; मगर इस संयोग में कोई भी ओछी,
अपमानजनक बात नहीं थी, बल्कि, कुछ कुछ प्रसन्न सा, अपेक्षित सा, उत्तेजित करता सा
था, जिससे हौले हौले और खुशी से दिल में गुदगुदी हो रही थी.
तो, वह अब पहुँचेगा उनके पास, अब तक अनजान, अनदेखे, अजीब, रहस्यमय, बंदी जीवों
के पास – औरतों के पास! और संजोया हुआ सपना अचानक वास्तविकता बन जाएगा, और वह उनकी
ओर देखता रहेगा, उनका हाथ पकड़ेगा, उनकी नाज़ुक हँसी और गाना सुनता रहेगा, और यह
होगा एक अबूझ, मगर प्यारा सा दिलासा उस आवेगभरी लालसा में, जिससे वह दुनिया में एक
औरत की ओर बढ़ रहा है, उसकी ओर, शूरोच्का की ओर! मगर उसके विचारों में कोई भी
विशिष्ट भावनात्मक उद्देश्य नहीं था, - उसे, एक महिला
द्वारा ठुकराए गए व्यक्ति को इस नग्न, खुले, माँगे हुए प्यार की ओर बड़ी शिद्दत से
कोई चीज़ आकर्षित किए जा रही थी, जैसे ठंड़ी रात में थके-माँदे और कँपकँपाते, परदेस
जाते हुए पंछियों को लाईट-हाउस की रोशनी आकर्षित करती है. बस, और कुछ नहीं.
घोड़े दाहिनी ओर मुड़े. पहियों की आवाज़ और ढिबरियों की खड़खड़ाहट एकदम रुक गई.
पहाड़ी से नीचे उतरते हुए काफ़िला ताक़त से और हल्के हल्के आगे बढ़ते हुए रास्ते और
गड्ढों पर डगमगाया और रोमाशोव ने आँखें खोलीं. दूर, कहीं, उसके पैरों के नीचे काफ़ी
दूर दूर तक बेतरतीब छोटी छोटी बत्तियाँ टिमटिमा रही थीं. कभी वे पेड़ों और अदृश्य
घरों के पीछे कूद जातीं, या वापस छलाँग लगाकर ऊपर को आ जातीं; और ऐसा लगता कि
वहाँ, घाटी में, एक बड़ा, बिखरा हुआ झुंड घूम रहा है, कोई अनोखा जुलूस हाथों में
लालटेनें लिए जा रहा है. एक पल को कहीं से गर्माहट महसूस हुई; बड़ी, काली टहनी
सिरों पर सरसराई और वर्मवुड़ की गंध आई, और उसी क्षण नम ठंडक महसूस हुई, जैसे
पुराने गोदाम से आती है.
“हम कहाँ जा रहे हैं?” रोमाशोव ने फिर पूछा.
“ज़ावाल्ये!” सामने बैठा हुआ व्यक्ति चिल्लाया, और रोमाशोव ने
अचरज से सोचा, “आह, ये तो लेफ़्टिनेंट एपिफ़ानोव है. हम श्लेफ़ेर्शा के
यहाँ जा रहे हैं.”
“क्या वाक़ई में तुम वहाँ कभी नहीं गए?” वेत्किन ने पूछा.
“तुम दोनों शैतान के पास जाओ!” रोमाशोव चीखा, मगर एपिफानोव हँस
कर बोला, “सुनिए, यूरी अलेक्सेइच, अगर आप चाहें तो हम वहाँ
फुसफुसाएँ कि आप ज़िन्दगी में पहली बार? हाँ? ओह, प्यारे! ओह, दुलारे! उन्हें ये
अच्छा लगता है. आपका क्या जाता है?”
रोमाशोव की चेतना फिर से घने, अपारदर्शी अंधेरे में लुप्त हो गई. फौरन, जैसे
अल्प-विराम के बिना, उसने स्वयँ को लकड़ी के फ़र्श और सभी दीवारों से लगी वेनिस की
कुर्सियों से सजे एक बड़े हॉल में देखा. प्रवेश द्वार पर और अन्य तीनों दरवाज़ों पर,
जो छोटे छोटे, अंधेरे कमरों में जाते थे, लंबे, पीले फूलों वाले लाल परदे लटक रहे
थे. ऐसे ही परदे अंधेरे आँगन में खुलने वाली खिड़कियों पर भी झूल रहे थे. दीवारों
पर टँके लैम्प्स जल रहे थे. रोशनी थी, धुँआ था और तीखे यहूदी व्यँजनों की ख़ुशबू आ
रही थी, मगर खिड़कियों से कभी कभी गीली हरियाली की, सफ़ेद, महकती अकासिया की और
बसंती हवा की ख़ुशबू भी आ जाती थी.
ऑफ़िसर्स लगभग दस थे. ऐसा लग रहा था कि
उनमें से हरेक एक ही साथ गा भी रहा था, और चिल्ला रहा था, और हँस रहा था. रोमाशोव,
आनन्द और भोलेपन से मुस्कुराते हुए, आश्चर्य से और प्रसन्नता से एक के पास से
दूसरे के पास जा रहा था, जैसे बेग-अगामालोव को, ल्बोव को, वेत्किन को, एपिफानोव
को, अर्चाकोव्स्की को, ओलिज़ार को, और औरों को पहली बार जान रहा हो. वहीं पर
स्टाफ-कैप्टेन लेशेन्को भी था; वह अपनी हमेशा की नम्र और अलसाई मुद्रा से खिड़की के
पास बैठा था. मेज़ पर, जैसे मानो अपने आप ही; जैसा कि इस शाम को सभी कुछ हो रहा था;
बियर की और चेरी के गाढ़े पेय वाली बोतलें प्रकट हो गईं. रोमाशोव किसी के साथ पी
रहा था, जाम टकरा रहा था और चुंबन ले रहा था; और यह महसूस कर रहा था कि उसके हाथ
और होंठ मीठे और चिपचिपे हो गए हैं.
वहाँ पाँच या छह औरतें थीं. उनमें से एक, देखने में क़रीब चौदह साल की लड़की, जो
खुले गले की कमीज़ और बुने हुए गुलाबी पैजामे में थी, बेग अगामालोव के घुटनों पर
बैठकर उसके शोल्डर स्ट्रैप की लेस से खेल रही थी. दूसरी, लाल रेशमी ब्लाउज़ और काली
स्कर्ट में, भूरे बालों वाली, पाउडर पुते चौड़े लाल चेहरे और गोल गोल, काली आँखों
तथा चौड़ी भँवों वाली ताक़तवर औरत रोमाशोव के पास आई.
“ऐ, मर्द! तुम इतने उकताए हुए क्यों हो? चलो, कमरे में चलें,” उसने नीची आवाज़ में कहा.
वह तिरछे, फैल कर, पैर पर पैर रखे मेज़ पर बैठ गई. रोमाशोव ने देखा, उसकी ड्रेस
के नीचे उसकी गोल और मज़बूत जाँघ मुलामियत से स्पष्ट नज़र आ रही थी. उसके हाथ काँपने
लगे और मुँह में ठंडक महसूस हुई. उसने सकुचाते हुए पूछा, “आपका नाम क्या है?”
“मेरा? माल्वीना.” वह उदासीनता से ऑफ़िसर से मुँह मोड़
कर अपनी टाँगें हिलाने लगी. “सिगरेट तो पिलाओ.”
न जाने कहाँ से दो यहूदी वादक भी आ गए: एक – वायलिन के साथ; दूसरा – ढपली लिए.
पोल्का डांस की उबाऊ और बेसुरी धुन पर, ढपली की गहरी गहरी थापों के साथ, ओलिज़ार और
अर्चाकोव्स्की ने नाचना शुरू किया. वे एक दूसरे के सामने उछलने लगे – कभी एक पैर
पर तो कभी दूसरे पर; फैले हुए हाथों की उंगलियों से चुटकियाँ बजाते पीछे हटते –
मुड़े हुए घुटनों को दूर फैलाते हुए और बड़ी उंगलियों को बगल के नीचे रखते, और बड़े
भद्दे ढंग से नितम्बों को हिलाते; फूहड़पन से अपने धड़ को कभी आगे तो कभी पीछे
झुकाते. अचानक बेग-अगामालोव कुर्सी से उछल पड़ा और तीखी, ऊँची आवेशपूर्ण आवाज़ में
चीखा, “ शैतान के पास जाओ, सिविलियन्स! फ़ौरन दफ़ा हो जाओ! फूटो!”
दरवाज़े में दो सिविलियन्स खड़े थे. कम्पनी के सारे ऑफ़िसर्स उन्हें जानते थे,
क्योंकि वे मेस के कार्यक्रमों में आया करते थे. एक था – सरकारी अफ़सर, और दूसरा - अदालत
के अफ़सर का भाई, एक छोटा-मोटा ज़मींदार, - दोनों बड़े सलीकेदार नौजवान थे.
सिविलियन कर्मचारी के चेहरे पर मुश्किल से ओढ़ी गई फीकी मुस्कुराहट थी, और वह
चापलूसीभरे लहज़े में, मगर बेतकल्लुफ़ी दिखाते हुए बोला, “इजाज़त दीजिए, महाशय...आपकी संगत में बैठने की. आप तो मुझे जानते हैं,
महाशय...मैं तो दूबेत्स्की हूँ, महाशय...हम, महाशय, आपके काम में ख़लल नहीं
डालेंगे.”
“ज़्यादा लोग होंगे तो मज़ा ही आएगा,” अदालत के अफ़सर के भाई ने कहा और
उसने तनावपूर्ण ठहाका लगाया.
“आ-ऊ-ट!” बेग-अगामालोव चीख़ा. “ मार्च!’
“महाशय, इन चूहों को बाहर निकालो!” अर्चाकोव्स्की ने ठहाका लगाया.
भगदड़ मच गई. कमरे की हर चीज़ गड्ड-मड्ड हो गई, कराहने लगी, हँसने लगी, पैर
पटकने लगी. लैम्पों की अग्नि-जिह्वाएँ धुँआ उगलते हुए ऊपर को उछलने लगीं. रात की
ठंडी हवा खिड़कियों से अन्दर घुस आई और कंपकंपाते हुए चेहरों पर साँस छोड़ने लगी.
सिविलियनों की, जो अब आँगन में थे; दयनीय, ऊँची और आँसुओं से भीगी आवाज़ें, मरियलपन
और दुष्ट भय से चीख रही थीं, “मैं तुझे ऐसे नहीं छोडूँगा! हम
कम्पनी-कमांडर से शिकायत करेंगे. मैं गवर्नर को लिखूँगा. ओप्रिच्निक *!”
“ ऊ-ल्यू-ल्यू-ल्यू-ल्यू! पकड़ो, छू:!” खिड़की से बाहर झुकते हुए वेत्किन
पतली आवाज़ में ज़ोर से चिढ़ाने लगा.
रोमाशोव को ऐसा लगा कि आज की सारी घटनाएँ एक के बाद एक हो रही हैं – बिना
रुके, बिना किसी उद्देश्य के. मानो उसके सामने एक शोर मचाती, भद्दी रील खुलती जा
रही है, बदसूरत, फूहड़, भयानक तस्वीरों वाली. वायलिन फिर से एक सुर में भुनभुनाने
लगी. ढपली
भी गूँजते हुए थरथराने लगी. कोई एक, बिना कोट के, सिर्फ सफ़ेद कमीज़ में, नीचे
बैठते बैठते, कमरे के बीचों बीच, हर मिनट नीचे गिरते हुए और हाथों से फ़र्श को
थामते हुए नाचने लगा.खुले काले बालों वाली और गर्दन की उभरी हड्डियों वाली दुबली
पतली ख़ूबसूरत
*-सामंतों के विद्रोह को कुचलने के लिए और अपने साम्राज्य को मज़बूत बनाने के
लिए त्सार ईवान ग्रोज़्नी द्वारा बनाई गई फौज़.
औरत ने – रोमाशोव ने पहले उसे नहीं देखा था – दयनीय लेशेन्को के गले में अपने
नंगी बाहें डाल दीं और संगीत और गहमागहमी के बीच ज़ोरदार आवाज़ से भिनभिनाते अंदाज़
में उसके कानों में गाने लगी:
जब हो जाएगा तपेदिक हमेशा के लिए,
पड़ जाओगे पीले, जैसे है ये दीवार.-
चारों ओर तेरे होंगे डॉक्टर.”
बोबेतिन्स्की ने पार्टीशन के पार एक अंधेरे कैबिन में ग्लास की बियर फेंकी, और
वहाँ से गुस्साई, भारी, उनींदी आवाज़ भुनभुनाई, “ हाँ, महाशय...ठीक नहीं होगा. कौन है वहाँ” क्या सूअरपन है?”
“सुनिए, क्या आप काफ़ी समय से यहाँ हैं?” रोमाशोव ने लाल ब्लाउज़ वाली औरत
से पूछा और चोरों की तरह, अपने आप से भी बेख़बर, उसके मज़बूत, गर्म पैर पर हथेली रख
दी.
उसने कुछ जवाब दिया जिसे वह सुन नहीं पाया. उसका ध्यान एक वहशी दृश्य ने
खींचा. एनसाईन ल्बोव दोनों में से एक वादक के पीछे भागा और पूरी ताक़त से उसके सिर
पर ढपली दे मारी. यहूदी जल्दी जल्दी, समझ में न आने वाली भाषा में चीखा और अपने
कोट की लंबी पूँछ को उठाए हुए, डर के मारे पीछे की ओर देखते हुए, एक कोने से दूसरे
कोने में भागने लगा. सब हँस रहे थे. अर्चाकोव्स्की हँसी के मारे फर्श पर गिर पड़ा
और आँखों में आँसू लिए चारों ओर लोटने लगा. फिर दूसरे वादक की दर्दभरी चीख सुनाई
दी. किसी ने उसके हाथों से वायलिन छिन लिया और पूरी ताक़त से उसे ज़मीन पर दे मारा.
उसका साऊँड बोर्ड टुकड़े-टुकड़े हो गया, सुरीली चटचटाहट के साथ; जो बड़े विचित्र ढंग
से यहूदी की बदहवास चीख में मिल गई. इसके बाद रोमाशोव की चेतना पर फिर कुछ अँधेरे
क्षण छा गए. और फिर अचानक उसने, मानो तेज़ बुखार और सरसाम की हालत में, देखा, कि
सब, जो कमरे में थे, अचानक चिल्लाने लगे, भागने लगे, हाथ हिलाने लगे. बेग-अगामालोव
के चारों ओर फ़ौरन घेरा बनाकर लोग खड़े हो गए, मगर फ़ौरन ही वे फैल गए, पूरे कमरे में
दौड़ने लगे.
“सब दफ़ा हो जाओ यहाँ से! मुझे किसी की ज़रूरत नहीं है!” बेग-अगामालोव तैश में चिल्ला रहा था.
वह दाँत पीस रहा था, अपने सामने की ओर मुक्के मार रहा था और पैर पटक रहा था.
उसका चेहरा लाल लाल हो गया, माथे पर रस्सियों की तरह दो नसें फूल गईं, जो नाक की
ओर जा रही थीं, सिर भयानकता से, नीचे झुका हुआ था और बाहर निकली पड़ रही आँखों में
अनावृत हो चुकी सफ़ेदी ख़ौफ़नाक ढंग से चमक रही थी.
वह जैसे मानवीय शब्द खो चुका था और भयानक कम्पन करती आवाज़ में गरज रहा था; जैसे
पागल हो चुका जंगली जानवर हो, “आ-आ-आ-आ-!”
अकस्मात् उसने फुर्ती से शरीर को बाईं ओर झुकाकर म्यान में से तलवार निकाल ली.
वह खनखनाई और सनसनाते हुए उसके सिर के ऊपर चमकी. और कमरे में उपस्थित सभी व्यक्ति
फौरन दरवाज़ों और खिड़कियों की ओर लपके. औरतें ऐसे चीख़ने लगीं जैसे हिस्टीरिया का
दौरा पड़ गया हो. आदमी एक दूसरे को धकेलने लगे. रोमाशोव को सीधे दरवाज़े की ओर धकेला
गया और कोई व्यक्ति उसके निकट से धक्का मुक्की करते हुए, बेरहमी से, खून निकल आने
तक, अपने शोल्डर-स्ट्रैप की बटन की नोक से उसके गाल को चीरता हुआ निकल गया. और तब
अचानक आँगन में एक दूसरे को काटते हुए, उत्तेजित, तेज़ तेज़ आवाज़ें चीख़ने लगीं.
रोमाशोव दरवाज़े में अकेला रह गया. उसका दिल जल्दी जल्दी और मज़बूती से धड़क रहा था,
मगर ख़ौफ़ के साथ साथ उसे एक मीठा, झँझावाती, प्रसन्नता से भरा पूर्वाभास भी हो रहा
था.
“काट दूँ-ऊं-ऊं-ऊं-गा!” बेग-अगामालोव दाँत पीसते हुए
चिल्लाया.
एक आम भय के नज़ारे से उस पर नशा छा गया. उसे मानो दौरा पड़ गया था; पूरी ताक़त
से कुछ ही वारों में उसने मेज़ तोड़ दी, फिर तैश में तलवार आईने पर चला दी; और उसके
परख़चे इन्द्रधनुषी बारिश के समान सभी ओर बरस गए. दूसरे वार में उसने मेज़ पर रखी
सारी बोतलें और ग्लास फोड़ दिए.
मगर अचानक किसी की कर्कश, कृत्रिम-बेशरम चीख़ सुनाई दी, “बेवकूफ़! जंगली!”
यह उसी सीधे बालों और नंगे हाथों वाली महिला की चीख़ थी जिसने अभी अभी लेशेन्को
को अपनी बाँहों में भरा था. रोमाशोव ने पहले उसे नहीं देखा था. वह फायरप्लेस के
पीछे कोने में खड़ी थी, और कूल्हों पर हाथ रखे पूरी की पूरी आगे को झुकते हुए, बिना
रुके, मंडी में सब्ज़ी बेचने वालियों जैसी चिल्लाए जा रही थी, “बेवकूफ़! जंगली! ग़ुलाम! यहाँ कोई भी तुमसे नहीं डरता! बेवकूफ़! बेवकूफ़! बेवकूफ़!
बेवकूफ़! ...”
बेग-अगामालोव ने नाक भौंह चढ़ाईं और मानो परेशान होकर अपनी तलवार नीचे कर ली.
रोमाशोव देख रहा था कि उसका चेहरा कैसे धीरे धीरे फक् पड़ता जा रहा था और आँखों में
खूँखार पीली चमक बढ़ती जा रही थी, और साथ ही वह अपने पैर नीचे नीचे मोड़ता जा रहा
था, पूरा सिकुड़ रहा था और अपनी गर्दन अन्दर को खींचते हुए, जैसे छलाँग मारने के लिए
तत्पर कोई जानवर हो.
“चुप!” उसने भर्राई आवाज़ में कहा, मानो थूक रहा हो.
“बेवकूफ़! गुंडा! आर्मी के बच्चे! नहीं रहूँगी चुप! बेवकूफ़! बेवकूफ़!” हर चीख के साथ थरथराती हुई महिला चिल्लाती रही.
रोमाशोव को इस बात का एहसास था कि वह भी हर चीख़ के साथ सफ़ेद पड़ता जा रहा है.
उसके दिमाग में भारहीनता की, ख़ालीपन की, आज़ादी की परिचित भावना घर करती जा रही थी.
भय और प्रसन्नता के विचित्र सम्मिश्रण ने अचानक उसकी आत्मा को ऊपर उठा दिया, जैसे
कि हल्का, सुरूरभरा झाग हो. उसने देखा कि बेग-अगामालोव औरत पर से नज़रें हटाए बिना,
धीरे धीरे सिर पर तलवार उठा रहा है. और अचानक पागलपन भरी वहशियत की, भय की, शरीर
की ठंडक की, हँसी की और बहादुरी की एक लपट रोमाशोव पर हावी होने लगी. आगे की ओर
कूदते हुए उसने बेग की तैशभरी फुत्कार सुनी, “तू चुप नहीं रहेगी? मैं तुझे आख़िरी...”
रोमाशोव ने मज़बूती से, ऐसी ताक़त से, जिसकी उसे स्वयँ भी अपने आप से उम्मीद
नहीं थी, बेग-अगामालोव की कलाई पकड़ ली. कुछ क्षण दोनों अफ़सर बिना पलक झपकाए,
बित्ते भर की दूरी से एकटक एक दूसरे की ओर देखते रहे. रोमाशोव बेग-अगामालोव की तेज़
तेज़, घोड़े की फुत्कार जैसी साँसें सुन रहा था; देख रहा था उसकी आँखों की भयानक
सफ़ेदी और तेज़ चमकती पुतलियाँ; और सफ़ेद, करकराते, गतिमान हो रहे जबड़े; मगर उसने
महसूस कर लिया था कि इस विद्रूप चेहरे पर वहशियत की आग पल पल बुझती जा रही है. और
उसे ख़ौफ़ और बेइंतहा खुशी महसूस हो रही थी, ज़िन्दगी और मौत के बीच यूँ खड़े हुए, और
यह जानकर कि इस खेल में उसी की जीत होगी. शायद, वे सभी, जो दूर से इस घटना को देख
रहे थे, इसके ख़तरनाक अंजाम को समझ गए थे. खिड़कियों के बाहर आंगन में ख़ामोशी थी, -
ऐसी ख़ामोशी कि कहीं, दो क़दमों की दूरी पर अंधेरे में सोलोवेय (नाइटेंगल) अचानक
ऊँची, सहज, कँपकँपाती तान छेड़ बैठा.
“छोड़!” बेग-अगामालोव के मुँह से भर्राए हुए बोल फूटे.
“बेग, तू औरत को नहीं मारेगा,” रोमाशोव ने शांति से कहा. “बेग, तू पूरी ज़िन्दगी शर्मिंदा रहेगा. तू नहीं मारेगा.”
बेग-अगामालोव की आँखों में पागलपन की आख़िरी चिंगारियाँ बुझ गईं. रोमाशोव ने
जल्दी से पलकें झपकाईं और गहरी साँस ली, जैसे मूर्च्छा टूटने के बाद लेते हैं.
उसका दिल जल्दी जल्दी और बेतरतीबी से धड़क रहा था, जैसा भय के प्रभाव में होता है;
और सिर फिर से भारी और गर्म हो गया.
“छोड़!” बेग-अगामालोव फिर चिल्लाया और उसने नफ़रत से अपना हाथ
छुड़ा लिया.
अब रोमाशोव महसूस कर रहा था कि वह उसका प्रतिरोध करने की हालत में नहीं है,
मगर अब वह उससे डर नहीं रहा था, बल्कि अपने साथी के कंधे को हौले से छूते हुए और
दया और प्यार से बोल रहा था, “माफ़ कीजिए...मगर बाद में आप खुद ही
मुझे धन्यवाद देंगे.”
बेग-अगामालोव ने झटके से, खड़खड़ाहट के साथ तलवार म्यान में डाल दी.
“ठीक है! नर्क में जाए!” वह ग़ुस्से से चीख़ा, मगर अब उसकी
आवाज़ में कृत्रिमता और परेशानी का पुट था. “हम तुम बाद में निपट लेंगे. आपको कोई
हक़ नहीं है...”
आँगन से इस दृश्य को देखने वाले सभी लोग समझ गए कि ख़तरनाक घड़ी गुज़र चुकी है. कुछ
ज़्यादा ही ज़ोर से, तनावपूर्ण ठहाके लगाते वे सब भीतर आए. अब वे सब परिचित,
दोस्ताना बेतकल्लुफ़ी से बेग-अगामालोव को शांत करने और उसे मनाने में जुट गए. मगर
वह अब बुझ चुका था, शक्तिहीन हो चुका था. और अचानक काले पड़ते उसके चेहरे पर थकान
का, वितृष्णा का भाव आ गया.
श्लेफेर्षा भागी भागी आई – मोटी औरत, चीकट छातियों वाली, काले, मोटे घेरों
वाली आँखों में कठोरता के भाव, बिना बरौनियों वाली. वह कभी एक तो कभी दूसरे अफ़सर
पर झपटती, उनकी आस्तीनों और बटनों को पकड़ कर उन्हें झकझोरती और रोनी आवाज़ में
चिल्लाती, “और, महाशयों, इस सब का पैसा मुझे कौन देगा : आईने का,
मेज़ का, शराब का, और लड़कियों का?”
और फिर कोई एक अनदेखा उसे समझाने के लिए रुक गया. बाकी के अफ़सर झुंड बनाकर
बाहर निकल गए. साफ, नज़ाकतभरी मई की रात की हवा हौले हौले और प्रसन्नता से रोमाशोव
के सीने में प्रवेश कर रही थी और उसके पूरे शरीर को ताज़ा, ख़ुशनुमा कँपकँपाहट से भर
रही थी. उसे ऐसा लगा कि उसके दिमाग से आज के नशे के निशान मिट चुके हैं, मानो गीले
स्पंज ने स्पर्श कर लिया हो.
बेग-अगामालोव उसके निकट आया और उसका हाथ पकड़ लिया.
“रोमाशोव, मेरे साथ बैठिए,” उसने कहा. “ठीक है?”
और जब वे एक दूसरे की बगल में बैठे और रोमाशोव ने दाहिनी ओर झुकते हुए देखा
कि कैसे घोड़े अव्यवस्थित चाल से अपने चौड़े
चौड़े नितंबों को उछालते हुए गाड़ी खींच रहे हैं, पहाड़ी के ऊपर, तो बेग-अगामालोव ने
टटोलते हुए, उसका हाथ ढूँढा और कस कर, दर्द होने तक और बड़ी देर तक दबाए रखा. उनके
बीच इसके अलावा कुछ भी बातचीत नहीं हुई.
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