XX
उसी दिन – ये
बुधवार को हुआ – रोमाशोव को संक्षिप्त सी सरकारी चिट्ठी मिली:
N – पैदल की अफसरों की अदालत सेकण्ड
लेफ्टिनेंट रोमाशोव को छह बजे ऑफ़िसर्स मेस के हॉल में उपस्थित रहने का निमंत्रण
देती है. ड्रेस – साधारण.
-- अदालत का प्रेसिडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल
मीगुनोव.
रोमाशोव अपनी अचानक
आई दुखभरी मुस्कुराहट रोक न पाया, “ये ड्रेस – साधारण – शोल्डर स्ट्रैप
वाली ट्यूनिक और रंगीन कमरबन्द के साथ – पहनी जाती थी ख़ास तौर से सर्वाधिक असाधारण
परिस्थितियों में : मुक़दमे के समय, सार्वजनिक दंड के समय, और अधिकारियों द्वारा
अप्रिय परिस्थितियों में बुलाए जाने पर.
छह बजे के क़रीब वह मेस में आया और अपने
बारे में अदालत के प्रेसिडेंट को सूचना देने का कारिन्दे को हुक्म दिया. उसे इंतज़ार
करने के लिए कहा गया. वह डाइनिंग हॉल में खुली खिड़की के पास बैठा, अख़बार हाथ में
लिया और उसे पढ़ने लगा; शब्दों को न समझते हुए, बगैर किसी दिलचस्पी के, यंत्रवत्
अक्षरों पर नज़र दौड़ाते हुए. तीन अफ़सरों ने, जो डाइनिंग रूम में थे, उसका रूखा
अभिवादन किया और दबी आवाज़ में आपस में बातें करने लगे; इस तरह कि वह सुन न पाए.
सिर्फ अकेले सेकण्ड लेफ्टिनेंट मीखिन ने देर तक और कस कर, गीली आँखों से उसका हाथ
थामे रखा, मगर कहा उसने कुछ नहीं; लाल हो गया, शीघ्रता से और फूहड़पन से उसने कोट
पहना और चला गया.
जल्दी ही अल्पाहार विभाग से होता हुआ
निकोलाएव डाइनिंग रूम में आया. उसका चेहरा विवर्ण था, आँखों की पलकें काली हो गई
थीं, बाँया गाल पूरे वक़्त थरथराहट से हिल रहा था, और उसके ऊपर, कनपटी के नीचे एक
बहुत बड़ा सूजा हुआ नील पड़ा था. रोमाशोव को स्पष्टत: और पीड़ा से कल की मारामारी की
याद आई और, पूरी तरह झुकते हुए, चेहरे पर बल डालकर, उसने स्वयँ को इन शर्मनाक
यादों के असहनीय बोझ तले दबा पाया; अख़बार के पीछे अपने आप को छुपा लिया और आँखें
भी पूरी तरह सिकोड़ लीं.
उसने सुना कि कैसे निकोलाएव ने अल्पाहार
गृह में एक पैग कोन्याक मांगी और कैसे उसने किसी से बिदा ली. फिर उसने अपने निकट
से निकोलाएव के क़दमों की आहट सुनी. दरवाज़ा धड़ाम् से बन्द हो गया. और अचानक कुछ
क्षणों के बाद उसने अपनी पीठ के पीछे, आँगन से सतर्कताभरी फुसफुसाहट सुनी, : पीछे
मुड़ कर न देखिए! शांति से बैठे रहिए. सुनिए.”
ये निकोलाएव बोल रहा था. रोमाशोव के हाथों
में अख़बार थरथराने लगा.
“मुझे ख़ुद को आपसे बात करने का अधिकार
नहीं है. मगर भाड़ में जाएँ ये फ्रांसीसी तकल्लुफ़. जो हुआ, उसे सुधार नहीं सकते.
मगर फिर भी मैं आपको एक शरीफ़ और सलीकेदार इंसान समझता हूँ. आपसे प्रार्थना करता
हूँ, सुन रहे हैं, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ: मेरी पत्नी के बारे में और गुमनाम
ख़तों के बारे में एक भी लब्ज़ नहीं! आप मेरी बात समझ गए?”
रोमाशोव ने अख़बार से स्वयँ को अपने
साथियों से छिपाते हुए, धीरे से सिर झुकाया. आँगन में पैरों के नीचे की रेत
चरमराई. केवल पाँच मिनटों के पश्चात् ही रोमाशोव मुड़ा और उसने आँगन की ओर देखा.
निकोलाएव जा चुका था.
“हुज़ूर,” अचानक उसके सामने कारिंदा खड़ा हो गया, “हिज़ हाईनेस आपको याद फर्मा रहे हैं.”
हॉल में, दूर वाली संकरी दीवार से लगी
हुई कुछ कपड़ा जड़ी मेज़ें रखी थीं, जिन्हें हरे कपड़े से ढाँका गया था. इनके पीछे
न्यायाधीश बैठे थे, जिनकी पीठ खिड़कियों की तरफ़ थी; जिससे उनके चेहरे काले नज़र आ
रहे थे. बीच में कुर्सी पर बैठा था प्रेसिडेंट – लेफ्टिनेंट कर्नल मीगुनोव; मोटा,
धृष्ट आदमी, बिना गर्दन का, ऊपर उठे गोल कँधे; उसके दोनों ओर थे – लेफ्टिनेंट
कर्नल्स : राफ़ाल्स्की और लेख; आगे दाँए – कैप्टेन ओसाद्ची और पीटर्सन; और बाँए –
कैप्टेन द्यूवेर्नुआ और स्टाफ-कैप्टेन दोरोशेन्की, कम्पनी का खजांची. मेज़ बिल्कुल
खाली थी, केवल दोरोशेन्को के सामने, जो इस न्यायिक जाँच का सेक्रेटरी था, कागज़ों
का एक गट्ठा पड़ा था. आँगन में गर्म, चमकता दिन होने के बावजूद बड़े, ख़ाली हॉल में
ठंडक और अंधेरा था;पुराने फर्नीचर की, फफूंद की और फर्नीचर के जीर्ण गिलाफ़ों की
बदबू आ रही थी.
प्रेसिडेंट ने अपने दोनों भरे पूरे, सफ़ेद
हाथ हथेलियाँ ऊपर करते हुए मेज़ के हरे कपड़े पर रखे और, बारी बारी से उनकी ओर देखते
हुए काष्ठवत् आवाज़ में बोलना शुरू किया, “सेकण्ड लेफ्टिनेंट, रोमाशोव, अफ़सरों की अदालत, जो कम्पनी कमांडर के आदेशानुसार
यहाँ आयोजित की गई है; उन घटनाओं का स्पष्टीकरण चाहती है, जिनकी तहत कल आपके और
लेफ्टिनेंट निकोलाएव के बीच अफ़सोसनाक और अक्षम्य झड़प हुई थी. कृपया इसके बारे में
विस्तारपूर्वक बताएँ.”
हाथ नीचे किए और कैप-बैण्ड को खींचते हुए
रोमाशोव उनके सामने खड़ा हो गया. वह स्वयँ को इतना कुचला हुआ, अटपटा और उद्विग्न
अनुभव कर रहा था, जैसा उसके साथ सिर्फ पढ़ाई के वर्षों में, परीक्षा के दौरान हुआ
करता था; जब वह अनुत्तीर्ण होता था. टूटी-फूटी आवाज़ में, अस्तव्यस्त और असंबद्ध
वाक्यों में; लगातार अस्पष्ट बड़बड़ाहट से, हास्यास्पद विस्मयबोधक शब्दों का प्रयोग
करते हुए; वह सुबूत पेश करने लगा. साथ ही, एक न्यायाधीश से दूसरे न्यायाधीश की ओर
नज़र घुमाते हुए, वह मन ही मन अपने प्रति उनके व्यवहार का मूल्यांकन करता रहा, ‘मीगुनोव
उदासीन है, वह, जैसे पत्थर का है, मगर प्रमुख न्यायाधीश की यह भूमिका, और वह
ख़ौफ़नाक अधिकार और ज़िम्मेदारी जो इससे जुड़े हैं, उसे सम्मानित कर रही है.लेफ्टिनेंट
कर्नल ब्रेम दयनीय और औरतों जैसी आँखों से देख रहा है, - आह, मेरे प्यारे ब्रेम,
क्या तुझे याद है कि मैंने कैसे तुझसे दस रूबल उधार लिए थे? बूढ़ा लेख संजीदगी दिखा
रहा है. आज वह गंभीर है, और उसकी आँखों के नीचे घेरे पड़े हैं; जैसे गहरे घाव के
निशान हों. वह मेरा दुश्मन नहीं है, मगर वह ख़ुद कई बार मेस में इतनी गड़बड़ कर चुका
है कि अब उसके लिए फ़ौजी अफ़सर के सम्मान के सतर्क, ज़िम्मेदार और निष्पक्ष
रक्षक-अधिकारी की भूमिका ही उचित है. और ओसाद्ची और पीटर्सन – ये तो वाक़ई में
दुष्मन हैं. क़ानूनन मैं, बेशक ओसाद्ची को मैं अनदेखा कर सकता हूँ – सारा झगड़ा
उसीके दफ़न-गीत से ही शुरू हुआ था, - मगर, फिर, क्या फ़र्क पड़ता है? पीटर्सन होठों
के एक कोने से कुछ कुछ मुस्कुरा रहा है – कुछ नीचता भरा, ज़हरीला सा, अप्रिय सा है.
कहीं उसे गुमनाम ख़तों के बारे में कुछ मालूम तो नहीं है? द्यूवेर्नूआ – उनींदा
चेहरा, और आँखें – जैसे दो धुँधलाए बड़े बड़े गोले. द्यूवेर्नुआ मुझे पसन्द नहीं
करता. हाँ, और दोरोशेन्को भी. सेकण्ड लेफ्टिनेंट, जो अपनी तनख़्वाह की रसीद पर
सिर्फ हस्ताक्षर करता है, मगर उसे कभी पाता नहीं है. तुम्हारा हाल बुरा है, मेरे
प्यारे यूरी अलेक्सेयेविच.”
“माफ़ कीजिए, एक मिनट,” अचानक उसकी विचार
शृंखला टूट गई. “लेफ्टिनेंट कर्नल
महोदय, क्या मुझे सवाल पूछने की इजाज़त देंगे?”
“कृपया पूछिए,” भाव खाते हुए मीगुनोव ने सिर हिलाया.
“हमें बताईये, सेकण्ड लेफ्टिनेंट रोमाशोव,” ओसाद्ची ने अधिकारपूर्वक शब्दों को
खींचते हुए शुरुआत की, “मेस में ऐसी
बदहवासी की हालत में पहुँचने से पहले आप कहाँ थे?”
रोमाशोव लाल पड़ गया और उसे महसूस हुआ कि
उसका माथा पसीने की बूँदों से ढँक गया है.
“ मैं गया था...मैं था...वो, एक जगह पर,” और उसने क़रीब क़रीब फुसफुसाहट से कहा, “मैं था, कोठे पर.”
“आहा, तो आप कोठे पर गए थे?” जानबूझकर ज़ोर से, निर्मम-स्पष्टता से
ओसाद्ची ने दुहराया. “और, शायद इस जगह
आपने कुछ पिया था?”
“हाँ-हाँ-पिया था,” टूटे टूटे जवाब दिया रोमाशोव ने.
“ठीक है. आगे कोई सवाल नहीं पूछना है
मुझे,” ओसाद्ची
प्रेसिडेंट की ओर मुड़ा.
“कृपया अपना बयान जारी रखिए,” मीगुनोव ने कहा. “तो आप इस बात पर रुके थे कि आपने लेफ्टिनेंट निकोलाएव के
मुँह पर शराब फेंकी थी...आगे?”
रोमाशोव ने असंबद्ध तरीक़े से, मगर
ईमानदारी और विस्तार से कल की घटना के बारे में बताया. वह लगभग किनारे से और
शर्मिन्दगी से उस पश्चात्तापके बारे में कहने ही वाला था, जो अपने कल के व्यवहार
पर उसे हो रहा था, मगर कैप्टेन पीटर्सन ने उसे बीच ही में रोक दिया. नील पड़े
नाखूनों वाली, पीले हाथों की अपनी लंबी, मुर्दा उँगलियों को इस तरह से मलते हुए
जैसे उन्हें धो रहा हो; उसने ज़ोर देकर, सौजन्य से, लगभग प्यार से, पतली और दबी दबी
आवाज़ में कहा, “हाँ, ख़ैर, ये सब,
बेशक आपके ख़ूबसूरत विचारों को इज़्ज़त ही दे रहा है, मगर हमें बताईये, सेकण्ड
लेफ्टिनेंट रोमाशोव...इस दुर्भाग्यपूर्ण और अपमानजनक हादसे से पहले क्या आप कभी
लेफ्टिनेंट निकोलाएव के घर गए थे?”
रोमाशोव सतर्क हो गया और, पीटर्सन की ओर
नहीं, बल्कि प्रेसिडेंट की ओर देखते हुए उसने असभ्यता से जवाब दिया, “हाँ गया था, मगर मैं समझ नहीं पा रहा हूँ
कि इसका मेरे ‘केस’ से क्या संबंध है?”
“रुकिए. कृपया सिर्फ सवालों के जवाब ही
दीजिए.” पीटर्सन ने उसे
रोका. “मैं यह कहना चाहता
हूँ कि आपकी लेफ्टिनेंट निकोलाएव से आपसी दुश्मनी के पीछे कोई विशेष कारण तो नहीं
थे – ऐसे कारण, जो फ़ौजी सेवा से संबंधित नहीं, बल्कि घरेलू, याने पारिवारिक हों?”
रोमाशोव तन गया और सीधे सीधे, खुल्लम
खुल्ला नफ़रत से उसने पीटर्सन की काली तपेदिक जैसी आँखों में देखा.
“मैं निकोलाएवों के घर मेरे अन्य परिचितों
की तरह ही जाता था; न ज़्यादा, न कम.” उसने ज़ोर से और तीखेपन से कहा. “और मेरे साथ उसकी कोई पुरानी दुश्मनी नहीं थी. सब कुछ अप्रत्याशित ढंग से और
अकस्मात् हो गया, क्योंकि हम दोनों नशे में धुत थे.”
“हे-हे-हे, ये तो हम सुन चुके हैं; आपके
नशे में धुत होने के बारे में,” फिर से पीटर्सन ने उसकी बात काटी, “मगर मैं सिर्फ इतना पूछना चाहता हूँ, कि आपकी उससे पहले कभी बहस हुई थी? नहीं,
बहस नहीं, आप मेरी बात समझ रहे हैं, बहस नहीं, सिर्फ कोई ग़लतफ़हमी, कोई खिंचापन,
किसी व्यक्तिगत आधार पर. जैसे, मिसाल के तौर पर, वैचारिक मतभेद या कोई और षड़यंत्र.
हाँ?”
“प्रेसिडेंट महाशय, क्या मुझे इन पूछे गए
सवालों के जवाब न देने का अधिकार है?” रोमाशोव ने अचानक पूछा.
“हाँ, ये आप कर सकते हैं,” मीगुनोव ने ठंडेपन से जवाब दिया. “आप, अगर चाहें तो किसी भी तरह की सफ़ाई
देने से इनकार कर सकते हैं, या उन्हें लिखकर दे सकते हैं. ये आपका अधिकार है.”
“तो मैं ये घोषणा करता हूँ कि कैप्टेन
पीटर्सन द्वारा पूछे गए किसी भी सवाल का जवाब मैं नहीं दूँगा,” रोमाशोव ने कहा. “ये उसके लिए और मेरे लिए भी अच्छा रहेगा.”
उसे कुछ और छोटी मोटी बातों के बारे में
पूछा गया, और इसके बाद प्रेसिडेंट ने कहा कि वह जा सकता है. मगर उसे कुछ अन्य
स्पष्टीकरण देने के लिए और दो बार बुलाया गया; पहली बार उसी दिन शाम को, दूसरी बार
गुरुवार को सुबह. व्यक्तिगत संबंधों में पूरी तरह से अनुभवहीन व्यक्ति, जैसे
रोमाशोव, भी समझ रहा था कि ये अदालत नाममात्र के लिए, अत्यंत ग़ैर ज़िम्मेदाराना और
बेहद असावधानी से, नौसिखियाना ढंग से सुनवाई कर रही है; कई सारी गलतियाँ कर रही
है; अकुशलता से काम कर रही है. सबसे बड़ी ग़ज़ब की बात तो ये हुई कि अनुशासन संहिता
की 149वीं धारा के स्पष्ट और सटीक आदेश के मुताबिक, कि अदालत की कार्रवाई की बाहर
चर्चा नहीं होगी; अदालत के सदस्यों ने अपने सम्मान को बरकरार नहीं रखा और बेकार की
बकवास में लिप्त हो गए. उन्होंने कार्रवाई के परिणामों के बारे में अपनी पत्नियों
को बता दिया; पत्नियों ने शहर की परिचित महिलाओं को. और उन्होंने – दर्जिनों को,
दाईयों को और नौकरानियों तक को बता दिया. एक ही दिन में रोमाशोव ताज़ा ख़बर और उस
दिन का हीरो बन गया. जब वह रास्ते से जा रहा था, तो उसकी ओर लोग खिड़कियों से, आँगन
के गेट से, किचन गार्डन से, बागड़ की झिरियों से देख रहे थे. औरतें दूर से उँगलियों
से उसे दिखा रही थीं; और वह लगातार अपनी पीठ के पीछे, जल्दी जल्दी फुसफुसाहट से
लिया गया अपना नाम सुन रहा था. शहर में किसी को भी इस बारे में सन्देह नहीं था कि
उसके और निकोलाएव के बीच द्वन्द्व-युद्ध होगा. उस द्वन्द्व-युद्ध के परिणाम के
बारे में बाज़ियाँ लगाई जा रही थीं.
गुरुवार की सुबह, लीकाचेवों के घर के
सामने से मेस की ओर जाते हुए, उसने अचानक सुना कि कोई उसका नाम लेकर उसे बुला रहा
है.
“यूरी अलेक्सेयेविच, यूरी अलेक्सेयेविच,
यहाँ आईये!” उसने रुक कर ऊपर
की ओर सिर उठाया; कात्या लीकाचेवा बागड़ के उस ओर बगीचे की बेंच पर खड़ी थी. वह सुबह
के हल्के जापानी गाऊन में थी, जिसकी तिकोनी कटाई के कारण उसकी कुँआरी गर्दन दिखाई
दे रही थी; और वह पूरी तरह गुलाबी, ताज़ातरीन, लज़्ज़तदार प्रतीत हो रही थी; एक मिनट
के लिए रोमाशोव को प्रसन्नता का अनुभव हुआ.
वह बागड़ से झुकी, जिससे उसे अपना हाथ दे
सके, जो धोने के कारण अभी तक ठंडा और गीला था. साथ ही वह अपनी बीन भी बजाती रही:
“आप हमारे यहाँ क्यों नहीं आते? लोगों को
भूलना शलम की बात है. बुला, बुला, बुला...श्, श्, श्; मैं सब कुछ, सब कुछ जानती
हूँ!” उसकी बड़ी, बड़ी
आँखों में अचानक भय का भाव छा गया. “ये लीजिए और इसे अपने गले में पहन लीजिए; ज़लूल, ज़लूल, ज़लूल पहन लीजिए.”
उसने सीधे अपने गाऊन से, सीने के पास से
रेशमी कपड़े में डोरी से बंधा कोई ताबीज़ निकाला और जल्दी से उसके हाथ में थमा दिया.
उसके बदन की गर्मी के कारण ताबीज़ पर अभी भी गर्माहट थी.
“फ़ायदा होता है?” रोमाशोव ने मज़ाक से पूछा. “क्या है ये?”
“ये ‘सीक्रेट’ है; ख़बरदार, मज़ाक न उड़ाना,
नास्तिक! बुला!”
आख़िर आज मैं मशहूर
हो गया हूँ. अच्छी लड़की है, रोमाशोव ने कात्या से बिदा लेते हुए सोचा. मगर वह इस
परिस्थिति में भी ख़ूबसूरत वाक्यों का इस्तेमाल करके अपने बारे में आख़िरी बार तृतीय
पुरुष में सोचने से स्वयँ को रोक न पाया.
द्वन्द्व-युद्ध के
मंजे हुए खिलाड़ी के गंभीर चेहरे पर भली मुस्कुराहट फिसल आई.
इसी दिन शाम को उसे फिर से अदालत में
बुलाया गया; मगर इस बार निकोलाएव के साथ. दोनों दुश्मन मेज़ के सामने एक दूसरे की
बगल में खड़े थे. उन्होंने एक भी बार एक दूसरे की ओर नहीं देखा, मगर उनमें से हर एक
दूसरे की मानसिक स्थिति का अनुभव करके तनाव से परेशान हो रहा था. वे दोनों
ज़िद्दीपन से, अविचल प्रेसिडेंट की ओर देख रहे थे, जब वह अदालत का फैसला पढ़ कर सुना
रहा था, “ N-पैदल कम्पनी के
अफ़सरों की अदालत, जिसके सदस्य थे,” – न्यायाधीशों की रैंक और उनके नाम पढ़े गए – “लेफ्टिनेन्ट कर्नल मीगुनोव की अध्यक्षता में, ऑफिसर्स मेस
में लेफ्टिनेंट निकोलाएव तथा सेकण्ड लेफ्टिनेंट रोमाशोव के बीच हुई झड़प की जाँच
करने के बाद इस नतीजे पर पहुँची कि उनके एक दूसरे को अपमानित करने की वजह से इन
दोनों अंडर-ऑफ़िसर्स के बीच का झगड़ा सुलह-सफ़ाई से समाप्त नहीं किया जा सकता और उनके
बीच द्वन्द्व-युद्ध ही एकमात्र उपाय है, आहत सम्मान और ऑफ़िसर की प्रतिष्ठा को
संतुष्ट करने का. अदालत की राय की पुष्टि कम्पनी कमांडर द्वारा कर दी गई है.”
पढ़ना समाप्त करने के बाद लेफ्टिनेंट
कर्नल मीगुनोव ने चश्मा उतार कर उसे ‘केस’ में रख लिया.
“आपको, महाशय,” उसने पाषाणवत् लहज़े में समारोहपूर्वक कहा, “अपने अपने गवाह-मध्यस्थ चुनने होंगे, हर
ओर से दो-दो, और उन्हें शाम के नौ बजे तक यहाँ, मेस में, भेजना होगा, जहाँ वे
हमारे साथ बैठकर द्वन्द्व-युद्ध की शर्तें तय करेंगे. मगर,” उसने उठते हुए और चश्मे का ‘केस’ पिछली जेब में रखते हुए
आगे जोड़ा, “मगर, अदालत के अभी
अभी पढ़े गए फ़ैसले का पालन करना आपके लिए अनिवार्य नहीं है. आपमें से हरेक को यह
आज़ादी है कि या तो वह द्वन्द्व-युद्ध करे, या...” उसने हाथ नचाए और थोड़ा रुका, “या फिर सेना की नौकरी छोड़ दे. इसके बाद...आप अब आज़ाद हैं,
महाशय...दो शब्द और. ये मैं अदालत के प्रेसिडेंट की हैसियत से नहीं, बल्कि एक
वरिष्ठ साथी के रूप में कह रहा हूँ; मैं आपको सलाह दूँगा, ऑफ़िसर्स महोदय, कि
द्वन्द्व-युद्ध होने तक मेस में न आएँ. इससे उलझनें बढ़ सकती हैं. फिर मिलेंगे.”
निकोलाएव झटके से मुड़ा और तेज़ तेज़ क़दमों
से हॉल से बाहर निकल गया. उसके पीछे पीछे रोमाशोव भी धीरे धीरे चला. उसे डर नहीं
लग रहा था, मगर उसे अचानक महसूस हुआ कि वह निपट अकेला है; अजीब तरीक़े से अलग थलग
कर दिया गया है; जैसे पूरी दुनिया से उसे काट दिया गया हो. मेस की ड्योढ़ी में आते
हुए उसने लंबे, शांत अचरज से आसमान की ओर देखा, पेड़ों को देखा, सामने की बागड़ के
पीछे बंधी गाय को देखा, पंछियों को देखा, जो रास्ते के बीच में धूल में नहा रहे
थे; और सोचा, “ये – सब कुछ
ज़िन्दा है, संघर्ष कर रहा है, भाग-दौड़ कर रहा है, बढ़ रहा है, और चमक रहा है; मगर
मुझे, अब और किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं, और न ही कोई दिलचस्पी है. मुझे मृत्यु दंड
दिया गया है. मैं अकेला हूँ.”
अलसाए से, क़रीब क़रीब उकताएपन से वह
बेग-अगामालोव और वेत्किन को ढूँढ़ने निकल पड़ा, जिन्हें गवाह-मध्यस्थ बनाने का उसने
निश्चय कर लिया था. दोनों फ़ौरन तैयार हो गए – बेग-अगामालोव उदास-संयम से, वेत्किन
प्यार भरे और अनेक अर्थों वाले हस्तांदोलन से.
घर जाने का रोमाशोव का मन नहीं था – वहाँ
दम घुटता था, और उकताहट थी. आंतरिक दुर्बलता के, अकेलेपन के, ज़िन्दगी की अलसाहटभरी
ग़लतफ़हमी के इन भारी पलों में उसे किसी क़रीबी, फ़िक्र करने वाले और साथ ही ऐसे
व्यक्ति की तलाश थी, जो संवेदनशील, उसे समझने वाला और नर्मदिल हो.
और अचानक उसे नज़ान्स्की की याद आई.
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