XXI
हमेशा की ही तरह
नज़ान्स्की घर पर ही था. एक बोझिल, नशीली नींद के बाद वह अभी अभी जागा था और अपने
हाथों को सिर के नीचे रखे, सिर्फ निचले अंतर्वस्त्रों में पलंग पर लेटा था. उसकी
आँखों में एक उदासीन, थकानभरा धुँधलापन था. उसके चेहरे का उनींदापन ज़रा भी नहीं बदला,
जब रोमाशोव ने उसके ऊपर झुकते हुए अविश्वास और उत्तेजना से पूछा, “नमस्ते, वासिली नीलिच, मैंने आपको परेशान तो नहीं किया?”
“नमस्ते,” नज़ान्स्की ने भर्राई, कमज़ोर आवाज़ में जवाब दिया. “क्या ख़ुशख़बर है? बैठिए.”
उसने रोमाशोव की ओर
अपना गर्म, नम हाथ बढ़ाया, मगर देखा उसकी तरफ़ इस तरह, जैसे उसके सामने उसका प्यारा,
दिलचस्प साथी नहीं; बल्कि बीत चुके, उबाऊ सपने का परिचित दृश्य हो.
“आपकी तबियत ठीक नहीं है?” उसके पैरों के निकट पलंग पर बैठते हुए रोमाशोव ने सकुचाहट से पूछा, “तो मैं आपको परेशान नहीं करूँगा. मैं जा रहा हूँ.”
नज़ान्स्की ने सिर
तकिये से कुछ ऊपर को उठाया और आँखें पूरी तरह सिकोड़ते हुए, प्रयत्नपूर्वक रोमाशोव
की ओर देखा.
“नहीं,,,रुकिए, आह, सिर कितना दुख रहा
है! सुनिए, गिओर्गी अलेक्सेयेविच...आपके पास कुछ है...है...कुछ असाधारण बात है.
ठहरिए, मैं ख़यालों को समेट नहीं पा रहा हूँ. आपको क्या हो रहा है?”
रोमाशोव ने उसकी ओर
ख़ामोश सहानुभूति से देखा. रोमाशोव ने ग़ौर किया कि पिछली मुलाक़ात के बाद से नज़ान्स्की
का पूरा चेहरा अजीब तरह से बदल गया था: उसकी आँखें गहरे धँस गईं थीं और उनके चारों
ओर काले घेरे पड़ गए थे; कनपटियाँ पीली पड़ गई थीं; और असमान गंदी त्वचा वाले गाल
धँस गए थे, नीचे की ओर चीकट हो रहे थे; और उन पर बड़े भद्दे तरीक़े से बालों के
विरले खूँट उग आए थे.
“कोई ख़ास बात नहीं है, सिर्फ आपको
देखना चाहता था,” लापरवाही से रोमाशोव ने कहा. “कल मैं निकोलाएव के साथ द्वन्द्व-युद्ध कर रहा हूँ. घर जाने का मन नहीं हो रहा
है. और हाँ, ख़ैर, सब एक ही बात है. फिर मिलेंगे. मुझे, जानते हैं न, बात करने के
लिए कोई नहीं मिल रहा था...आत्मा पर बोझ महसूस हो रहा है.
नज़ान्स्की ने आँखें
बन्द कर लीं, और पीड़ा से उसका चेहरा विकृत हो गया. ज़ाहिर था कि इच्छा शक्ति के कृत्रिम तनाव से वह अपनी चेतना
को वापस ला रहा था. जब उसने आँखें खोलीं, तो उनमें एकाग्र, गर्माहटभरी चिंगारियाँ
चमक रही थीं.
“नहीं, रुकिए...हम ऐसा करते हैं,” नज़ान्स्की ने मुश्किल से करवट ली और कोहनी के बल उठा. “वहाँ, उस अल्मारी से लाईये...आप जानते हैं...नहीं, सेब की ज़रूरत नहीं
है...वहाँ पेपरमिंट की गोलियाँ हैं. शुक्रिया, मेरे अपने. हम ऐसा करते
हैं...फू...कैसा घिनौनापन है! ...मुझे खुली हवा में कहीं ले चलिए – यहाँ बड़ा
घिनौना है, और मुझे यहाँ डर लगता है...हमेशा ऐसे डरावने भ्रम होते हैं. जाएँगे,
नाव में सैर करेंगे और बातें करेंगे. ठीक है?”
वह माथे पर बल
डालते हुए, बड़ी अरुचि दर्शाते हुए पेग पर पेग पीता रहा और रोमाशोव देख रहा था कि
उसकी नीली आँखों में कैसे धीरे धीरे जीवन की ज्योति और चमक प्रकट हो रही है; और वे
कैसे फिर से ख़ूबसूरत हो गई हैं.
घर से निकल कर
उन्होंने किराए पर गाड़ी ली और शहर के छोर की ओर गए, नदी की ओर. वहाँ, डॅम के एक ओर
यहूदियों की पनचक्की थी – बड़ी लाल इमारत; और दूसरे ओर – स्नानगृह थे, और वहीं पर
किराए पर नौकाएँ दी जाती थीं. रोमाशोव चप्पुओं की ओर बैठा, और नज़ान्स्की सिरे की
ओर अधलेटा बैठ गया, अपने आप को ओवरकोट में लपेटे.
बाँध द्वारा रोकी
गई नदी चौड़ी और निश्चल थी, जैसे कोई बड़ा तालाब हो. उसके दोनों ओर के किनारे समतल
और एक सा ऊपर की ओर जाते थे. उन पर लगी घास इतनी एक सी, इतनी चमकीली और रसभरी थी,
कि दूर से उसे हाथ से छूने का मन करता. किनारों के नीचे, पानी में हरे हरे सरकंडे
दिखाई दे रहे थे और घनी, काली गोल-गोल पत्तियों के बीच वाटर-लिली की बड़ी बड़ी सफ़ेद
कलियाँ झाँक रही थीं.
रोमाशोव ने
निकोलाएव के साथ हुई झड़प का विस्तार से वर्णन किया. नज़ान्स्की ने उसे सुना सोच में
डूबे हुए, सिर झुकाए, नीचे पानी की ओर देखते हुए, जो नाव की नोक से दूर तक और
चौड़ाई में, द्रवित काँच की तरह सुस्त गहरी धाराओं में इधर से उधर बिखर रहा था.
“सच बताना, आप डर तो नहीं रहे हैं,
रोमाशोव?” नज़ान्स्की ने हौले से पूछा.
“द्वन्द्व-युद्ध से? नहीं, नहीं डरता,” रोमाशोव ने जल्दी से जवाब दिया. मगर वह फ़ौरन चुप हो गया और एक सेकंड के लिए
उसने सजीव कल्पना की कि वह कैसे निकोलाएव के सामने, बिल्कुल नज़दीक, खड़ा होगा, और
उसके फैले हुए हाथ में रिवाल्वर का नीचे की ओर झुकता हुआ हत्था देखेगा, - “नहीं, नहीं,” रोमाशोव ने शीघ्रता से आगे कहा. “मैं झूठ नहीं बोलूँगा, कि नहीं डरता. बेशक, ये डरावना है. मगर मैं जानता हूँ
कि मैं कायरता नहीं दिखाऊँगा; भाग नहीं जाऊँगा; माफ़ी नहीं मांगूँगा.”
नज़ान्स्की ने शाम के, हौले-हौले
कुलकुलाहट करते, कुछ गर्माहट भरे पानी में अपनी उंगलियों के पोर डाले और धीरे
धीरे, निर्बल आवाज़ में, हर पल खाँसते हुए कहना शुरू किया, “आह, मेरे प्यारे, प्यारे रोमाशोव, तुम ऐसा क्यों करना चाहते
हो? सोचिये! अगर आपको पक्का मालूम है कि आप कायरता नहीं दिखाएँगे, - अगर पूरी तरह पक्का
यक़ीन है,- तो इससे कितना अधिक साहसी कार्य होगा इनकार कर देना.”
“उसने मुझे मारा...चेहरे पर!” रोमाशोव ने ज़िद्दीपन से कहा, और उसके
भीतर फिर से, सुलगते हुए क्रोध की बोझिल लपटें उठने लगीं.
“तो ठीक है, न; मारा तो मारा,” नज़ान्स्की ने स्नेहपूर्वक प्रतिवाद किया
और दुखी, प्यारभरी आँखों से रोमाशोव की ओर देखा. “क्या वाक़ई में ख़ास बात यही है? दुनिया में हर चीज़ गुज़र जाती
है, आपका दर्द और आपकी नफ़रत भी गुज़र जाएगी. और आप ख़ुद भी इस बारे में भूल जाएँगे.
मगर उस आदमी को, जिसे आपने मार डाला है; आप कभी नहीं भूल पाएँगे. वह आपके साथ आपके
बिस्तर पर होगा, मेज़ पर होगा, तनहाई में होगा और भीड़ में भी होगा. बकवास करने
वाले, छँटे हुए बेवकूफ़, ठस दिमाग़, रंगबिरंगे तोते यक़ीन दिलाते हैं कि
द्वन्द्व-युद्ध में की गई हत्या – हत्या नहीं होती. क्या बकवास है! मगर वे बड़ी
भावुकता से विश्वास करते हैं कि डाकुओं को अपने शिकारों के दिमाग़ों और खून के सपने
आते हैं. नहीं; हत्या – हमेशा हत्या ही होती है. और यहाँ महत्वपूर्ण है, न दर्द, न
मौत, न अत्याचार, न खून और लाश के प्रति अतीव घृणा, - नहीं सबसे भयानक बात यह है
कि आप एक आदमी से उसकी ज़िन्दगी की ख़ुशी छीनते हैं. ज़िन्दगी की महान ख़ुशी!” – अचानक नज़ान्स्की ने ज़ोर से अपनी बात
दोहराई, आवाज़ आँसुओं से सराबोर थी. “क्योंकि कोई भी – न आप, न मैं; आह, सीधी सादी बात कहूँ, तो दुनिया में एक भी
आदमी मृत्योपरांत के किसी भी जीवन में विश्वास नहीं करता है. इसीलिए सब मौत से
डरते हैं. मगर कमज़ोर दिल वाले बेवकूफ़ अपने आप को फुसलाते हैं दमकते रंगीन बागों
की, नपुंसकों के मीठे गीतों की कल्पना से; और मज़बूत इन्सान – चुपचाप आवश्यकता की
सीमा पार कर जाते हैं. हम – मज़बूत दिल वाले नहीं हैं. जब हम सोचते हैं कि हमारी
मृत्यु के बाद क्या होगा, तो कल्पना करते हैं एक ख़ाली, ठंडे और अंधेरे तहख़ाने की.
नहीं, प्यारे, ये सब झूठी बातें हैं: तहख़ाना एक सुखदायी धोखा होता; ख़ुशनुमा दिलासा
होता; मगर कल्पना कीजिए उस ख़याल की पूरी भयंकरता की कि बिल्कुल, बिल्कुल कुछ भी
नहीं होगा; न अंधेरा, न ख़ालीपन, न ठंडक...इस बारे में कोई ख़याल भी नहीं होगा, भय
भी नहीं बचेगा! कम से कम भय! सोचिये!”
रोमाशोव ने चप्पू नाव के किनारों पर फेंक
दिए. नाव पानी पर मुश्किल से हिल रही थी, और यह सिर्फ इसी बात से प्रतीत होता था
कि हरे हरे किनारे कितने हौले हौले विरुद्ध दिशा में जा रहे हैं.
“हाँ, कुछ भी नहीं होगा,” रोमाशोव ने सोच में डूबे डूबे कहा.
“और देखिए, नहीं, सिर्फ देखिए, कितनी
ख़ूबसूरत, कितनी आकर्षक है ज़िन्दगी!” नज़ान्स्की चहका, अपने चारों ओर हाथ फैलाकर घुमाते हुए, “ओह, ख़ुशी! ओह, स्वर्गीय सौन्दर्य ज़िन्दगी का! देखिए: नीला
आसमान, शाम का सूरज, ख़ामोश पानी – उल्लास से थरथराने लगते हो, जब इनकी ओर देखते
हो, - वो वहाँ, दूर, पवनचक्कियाँ अपने पंख फड़फड़ा रही हैं; हरी छोटी-छोटी घास,
किनारे के निकट पानी – गुलाबी, डूबते सूरज की रोशनी में गुलाबी; आह, कितना विचित्र
है ये सब, कितना नाज़ुक, कितना सुख से परिपूर्ण!”
नज़ान्स्की ने अचानक हाथों से आँखें बन्द
कर लीं और रो पड़ा, मगर उसने फौरन अपने आप पर काबू कर लिया और अपने आँसुओं से
लज्जित न होते हुए, रोमाशोव की ओर गीली, चमकीली आँखों से देखते हुए कहने लगा, “ नहीं, अगर मैं रेलगाड़ी के नीचे आ जाऊँ,
और अगर मेरा पेट कट जाता है, और मेरे आंतरिक अंग रेत में मिल जाते हैं और पहियों
पर चिपक कर घूमने लगते हैं; और यदि इस अंतिम क्षण में मुझसे पूछा जाता है: “तो, क्या, क्या अभी भी ज़िन्दगी ख़ूबसूरत
है?” तो मैं एहसानभरे
धन्यवादयुक्त उल्लास से कहूँगा, “आह, कितनी ख़ूबसूरत है वो!” कितनी ख़ुशी मिलती
है हमें सिर्फ देखने से! और अगर साथ में संगीत, फूलों की ख़ुशबू, मीठा मीठा
प्रियतमा का प्यार भी हों और एक है अपरिमित आनन्द – जीवन का सुनहरा सूरज, मानवीय
विचार! मेरे अपने यूरोच्का!...माफ़ कीजिए कि मैंने आपको इस तरह पुकारा,” नज़ान्स्की ने जैसे क्षमायाचना करते हुए
दूर से ही अपना थरथराता हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया. “मान लो, कि आपको जेल में डाल दिया जाता है...हमेशा, हमेशा
के लिए; और ज़िन्दगी भर आप एक झिरी से सिर्फ दो पुराने कबेलू ही देख सकते
हैं...नहीं, ये भी नहीं; मान लीजिए कि आपकी जेल में रोशनी की एक किरण भी नहीं आती
है, कोई आवाज़ भी नहीं पहुँचती है – कोई बात नहीं! फिर भी क्या इसकी तुलना मौत के
अजीब से ख़ौफ़ से की जा सकती है? आपके पास ख़याल तो बचे हैं, कल्पना है, यादें हैं,
सृजन है – तो इस सब के सहारे भी जिया जा सकता है. और आपके पास जीवन के आनन्द से
उल्लास के क्षण भी हो सकते हैं.”
“हाँ, ज़िन्दगी ख़ूबसूरत है,” रोमाशोव ने कहा.
“ख़ूबसूरत!” फट पड़ा नज़ान्स्की. “और, अब दो आदमी, इसलिए कि, उनमें से एक ने दूसरे को मारा, या उसकी पत्नी का
चुंबन लिया, या सिर्फ...नज़दीक से गुज़रते हुए अपनी मूँछों पर ताव देते हुए उसकी ओर
मग़रूरियत से देखा – ये दो आदमी एक दूसरे पर गोली चलाते हैं; एक दूसरे को मार डालते
हैं. आह, नहीं, उनके ज़ख़्म, उनके दुख, उनकी मृत्यु – ये सब जहन्नुम में! असल में वह
स्वयँ की हत्या कर रहा है – दयनीय घूमता फिरता स्नायुओं का गोला; जो इन्सान कहलाता
है? वह हत्या करता है सूरज की; गर्म, प्यारे सूरज की; साफ़ आसमान की; प्रकृति की, -
जीवन की विभिन्न प्रकार की ख़ूबसूरती की, मार डालता है आनन्द को और आत्माभिमान को –
मानवीय विचार को! वह उसे मार डालता है, जिसे कभी भी, कभी भी, कभी भी वापस नहीं
लौटाया जा सकता. आह, बेवकूफ़, बेवकूफ़!”
नज़ान्स्की ने
दयनीयता से, लंबी साँस लेते हुए सिर हिलाया और नीचे झुका लिया. नाव सरकंडों के
बीचे में पहुँच गई थी. रोमाशोव ने फिर से चप्पू संभाल लिए. लम्बे, हरे, कड़े डंठल,
नाव से घिसटते हुए, सम्मानपूर्वक धीरे धीरे झुक रहे थे. खुले पानी के मुक़ाबले यहाँ
कुछ ज़्यादा अंधेरा और ठंडक थी.
“तो मुझे क्या करना चाहिए?” रोमाशोव ने उदासी और रुखाई से पूछा, “रिज़र्व में चला जाऊँ? मैं कहाँ
जाऊँगा?”
नज़ान्स्की ने
संक्षिप्त, प्यारी सी मुस्कुराहट बिखेरी, “रुको, रोमाशोव. मेरी आँखों में देखो.
ये, ऐसे. नहीं, आप मुँह न मोड़िये; सीधे सीधे देखिए और बेदाग़ अंतरात्मा से जवाब
दीजिए. क्या आप इस बात में यक़ीन करते हैं कि आप एक दिलचस्प, अच्छे, उपयोगी काम के
लिए सेवा कर रहे हैं? मैं आपको अच्छी तरह जानता हूँ; दूसरे सब लोगों से बेहतर, और
मैं आपकी आत्मा को महसूस कर सकता हूँ. आप बिल्कुल भी इस बात में विश्वास नहीं करते
हैं.”
“नहीं,” रोमाशोव ने दृढ़ता से जवाब दिया. “मगर, मैं जाऊँगा कहाँ?”
“ठहरिए, जल्दी मत मचाईये. आप हमारे
अफ़सरों की ओर देखिये. ओह, मैं गारद के अफ़सरों की बात नहीं कर रहा, जो बॉल डान्स के
आयोजनों में नृत्य करते हैं; फ्रांसीसी बोलते हैं, और अपने माँ-बाप और क़ानूनी
बीबियों के पैसों पर गुलछर्रे उड़ाते हैं. नहीं, आप हमारे बारे में सोचिए; अभागे
रंगरूटों के बारे में; पैदल सेना के बारे में; बेहतरीन और बहादुर रूसी सेना के
प्रमुख केन्द्र के बारे में – ये सब सड़ा हुआ, फटा-पुराना, बचा-खुचा, कचरा माल है.
हद से हद – अंग भंग हुए कैप्टनों के बेटे हैं. ज़्यादातर तो – बुद्धिमत्ता से डरने
वाले, स्कूल पूरा कर चुके बच्चे, वास्तववादी; सेमिनरी पूरी न करने वाले भी हैं.
मिसाल के तौर पर हमारी कम्पनी को ही लो. कौन सब से अच्छी तरह से, और सबसे ज़्यादा
समय तक नौकरी करता है? ग़रीब, परिवारों के जुए तले दबे, भिखारी; हर तरह के समझौते
के लिए, हर क्रूरता के लिए, हत्या के लिए, सिपाहियों के पैसों की चोरी करने के लिए
भी तैयार; और यह सब सिर्फ अपनी रोजी रोटी के लिए. उसे हुक्म दिया जाता है:
फ़ायर!-और वह गोली मारता है, -किसे? किसलिए? शायद, यूँ ही? उसके लिए सब एक समान है,
वह तर्क नहीं करता. वह जानता है कि घर पर रिरिया रहे हैं उसके गन्दे, सूखा-रोग से
पीड़ित बच्चे; और वह बिना सोचे-समझे, कठफोड़े की तरह, आँखें निकाले, हथौड़े की तरह बस
एक ही शब्द खटखटाता जाता है : ‘शपथ!’ उसका सारा हुनर, सारी विशेषता शराब के नशे
में डूब जाते हैं. हमारे ऑफ़िसर्स में से 75% बीमार हैं सिफ़लिस से. कोई एक ख़ुशनसीब –
और ये होता है पाँच साल में एक बार – अकादेमी में प्रवेश पाता है; उसे बिदा दी
जाती है नफ़रत से. ज़्यादा चिकने-चुपड़े और जिन्हें किसी का संरक्षण प्राप्त है, ऐसे
लोग सुरक्षा-संतरी बन जाते हैं, या किसी बड़े शहर में पुलिस की नौकरी के सपने देखते
हैं. कुलीन; वे भी जिनके पास छोटी-मोटी जागीर है, ज़ेम्स्त्वो (स्थानीय प्रशासन)
में अधिकारी बन जाते हैं. यह मान लो कि केवल संवेदनशील, दिल वाले व्यक्ति ही बच
जाते हैं, मगर वे करते क्या हैं? उनके लिए फ़ौजी सेवा – ये बस तिरस्कार योग्य काम
है, बोझ है, घृणित जुआ है. हर कोई अपने लिए कोई और दिलचस्प काम ढूँढ़ने की कोशिश
में लगा रहता है, जो उसे पूरी तरह मशग़ूल रखे. कोई चीज़ों का संग्रह करने लगता है, कई
लोग बेसब्री से शाम का इंतज़ार करते हैं जब घर में, लैम्प के निकट बैठकर, हाथ में
सुई लें और कोई छोटा मोटा कार्पेट बुनें या अपनी तस्वीर के लिए कोई फोटो-फ्रेम
बनाएँ. नौकरी करते समय वह इसके बारे में ऐसे सोचते हैं, जैसे कोई रहस्यमय,
मीठा-मीठा आनन्द हो. ताश, औरतों को हासिल करने का कोई शेखीभरा खेल – इसके बारे में
तो मैं बात ही नहीं कर रहा. सबसे ज़्यादा घृणित है फ़ौजी की प्रसिद्धी की
महत्वाकांक्षा; ओछी, क्रूर महत्वाकांक्षा. ये – ओसाद्ची और उसका गुट, जो अपने
सिपाहियों की आँखें और दाँत निकाल देते हैं. जानते हैं, मेरे सामने अर्चाकोव्स्की
ने अपने अर्दली को इतनी बुरी तरह से पीटा कि मुझे ज़बर्दस्ती उसे छुड़ाना पड़ा. फिर न
केवल दीवारों पर, बल्कि छत पर भी ख़ून दिखाई दिया. और, जानना चाहते हैं, ये सब कैसे
ख़त्म हुआ? ऐसे, कि अर्दली रेजिमेंट कमांडर के पास शिकायत करने पहुँचा, और रेजिमेंट
कमांडर ने उसे चिट्ठी लेकर कम्पनी के अंडर-ऑफ़िसर के पास भेजा; और अंडर-ऑफ़िसर ने
उसके नीले, सूजे, ख़ून से लथपथ चेहरे पर और आधे घंटे तक मारा. इस सिपाही ने दो बार
इन्स्पेक्शन के समय फ़रियाद भी की थी, मगर कोई नतीजा नहीं निकला.”
नज़ान्स्की चुप हो
गया और मानसिक तनाव से अपनी हथेलियों से कनपटियाँ खुजाने लगा.
“ठहरिए...आह, ख़याल कैसे भाग रहे हैं...” उसने परेशानी से कहा. “कितनी बुरी बात है, जब आप ख़यालों पर
क़ाबू नहीं करते हो, बल्कि वे आपको चलाने लगते हैं...हाँ, याद आया! अब आगे. आप बाकी
के अफसरों की ओर भी नज़र डालिए. वो, मिसाल के तौर पर, स्टाफ-कैप्टेन प्लाव्स्की. न
जाने खाता क्या है – अपने केरोसिन स्टोव पर ख़ुद ही न जाने क्या पकाता है,
क़रीब-क़रीब चीथड़े पहनता है, मगर अपनी 48रुबल्स की तनख़्वाह में से हर महीने 25
रुबल्स बचा लेता है. ओ हो हो! उसके पास बैंक में क़रीब दो हज़ार पड़े हैं, और, वह
चुपके से अपने साथियों को ख़तरनाक सूद पर उधार देता है. क्या आप सोचते हैं कि ये
उसकी जन्मजात कंजूसी है? नहीं, नहीं; ये सिर्फ एक बहाना है बोझिल और समझ में न आने
वाली बेमतलब की फ़ौजी सेवा से दूर भागने का...कैप्टेन स्तेल्कोव्स्की – अक्लमन्द,
ताक़तवर, बहादुर आदमी है. मगर उसके जीवन का सारांश क्या है? वह कच्ची उम्र की
किसानों की लड़कियों को फुसलाता है. आख़िर में आप लेफ्टिनेंट-कर्नल ब्रेम को ही
लीजिए. प्यारा, बढ़िया जीनियस है, सबसे भला इन्सान – बस, शानदार – और वह, बस अपने
पशुघर की देखभाल में ही अपने आपको व्यस्त रखता है. उसके लिए फ़ौजी सेवा, परेड,
ध्वज, सज़ा, सम्मान...इस सब का क्या मतलब है? ओछी, अनावश्यक चीज़ें हैं ज़िन्दगी की.”
“ब्रेम – जीनियस है, मुझे वह अच्छा
लगता है,” रोमाशोव ने पुश्ती जोड़ी.
“ठीक है, ठीक है; बेशक वह बड़ा प्यारा
इन्सान है,” नज़ान्स्की ने अलसाए ढंग से सहमति दर्शाई. “मगर, जानते हैं,” उसने अचानक नाक-भौंह सिकोड़ते हुए कहा, “जानते हैं, कैसी हरकत करते देखा मैंने उसे प्रैक्टिस के समय? रात की शिफ्ट के
बाद हम ‘अटैक’ की प्रैक्टिस कर रहे थे. हम सब उस समय तक बेहाल हो चुके थे, थक चुके
थे, सब उखड़े-उखड़े से थे: क्या ऑफिसर्स, क्या सिपाही. ब्रेम ने बिगुल बजाने वाले को
‘अटैक’ की धुन बजाने की आज्ञा दी; मगर वह, ख़ुदा ही जाने क्यों, ‘रिज़र्व’ की धुन
बजाने लगा. एक बार, दूसरी बार, तीसरी बार भी वही. और अचानक यही – प्यारा, भला,
जीनियस ब्रेम घोड़ा दौड़ाता हुआ बिगुल वादक के पास आया, जो मुँह में बिगुल पकड़े था,
और पूरी ताक़त से उसने बिगुल पर मुट्ठी से वार किया! हाँ. और मैंने ख़ुद ने भी देखा
कि कैसे बिगुलवादक खून के साथ साथ उखड़े हुए दाँत भी बाहर थूक रहा है.
“आह, हे भगवान!” घृणा से रोमाशोव कराहा.
“ वे सब ऐसे ही हैं, सबसे अच्छे भी,
नर्म दिल भी, बढ़िया बाप और ध्यान रखने वाले पति – सब के सब फ़ौजी सेवा में निकृष्ट,
डरपोक, कटु, बेवकूफ़ जानवर बन जाते हैं. आप पूछेंगे, क्यों? वो इसलिए कि उनमें से
किसी को भी फौजी सेवा पर भरोसा नहीं है और इन्हें इस सेवा का कोई तर्कसंगत
उद्देश्य नहीं दिखाई देता. आप तो जानते ही हैं कि बच्चे कैसे ‘लड़ाई’ का खेल खेलना
पसन्द करते हैं? इतिहास में भी जोशीले बचपन का एक वक़्त था; ये वक़्त था जोशीली और
प्रसन्नचित्त नौजवान पीढ़ियों का. तब लोग अपने अपने आज़ाद गुट बनाकर चला करते थे, और
युद्ध सब के लिए एक नशीली खुशी जैसा, ख़ूनी और बहादुरीभरा दिल बहलाव का साधन था.
सबसे बहादुर, सबसे ताक़तवर और सबसे चालाक व्यक्ति ही नेता चुना जाता था, और उसका
शासन, जब तक कि अधीनस्थ लोग उसे मार नहीं डालते, सबके लिए ईश्वर की आज्ञा के समान
था. मगर धीरे धीरे मानव का विकास होता गया और हर साल वह अधिकाधिक बुद्धिमान होता
रहा, और बचकाने शोर गुल भरे खेलों के स्थान पर उसके विचार दिन प्रतिदिन अधिक
संजीदा, अधिक गहरे होते जाते हैं. निडर साहसी ताश के खेल में माहिर होते गए,
सिपाही अब फ़ौजी सेवा में इसलिए नहीं जाता कि वह ख़ुशी देने वाला और हिंस्त्र
व्यवसाय है. नहीं, उसे गर्दन में कमन्द फेंक कर फँसाया जाता है, और वह प्रतिकार
करता है, बददुआएँ देता है, रोता है. और भयंकर, आकर्षक, निर्दय और सम्माननीय
योद्धाओं के तबके के प्रमुख सरकारी कर्मचारी बन गए हैं, जो अपनी छोटी सी आमदनी के
सहारे कायरता से जीते हैं. उनकी बहादुरी – सीलन भरी बहादुरी है. और फ़ौजी अनुशासन –
भय उत्पन्न करने वाला अनुशासन है, जो परस्पर नफ़रत की सीमारेखा है. ख़ूबसूरत फ़ज़ान*(चेड़-पक्षी)
बदरंग हो गए हैं. सिर्फ एक मिलता जुलता उदाहरण मुझे पता है. मानवता के इतिहास में
ये – मॉन्क्स का जीवन है. इसका आरंभ शांतिपूर्ण, सुन्दर और दिल को छू लेने वाला
था. हो सकता है – किसे मालूम – कि वह दुनिया की आवश्यकता के फलस्वरूप निर्मित हुआ
हो? मगर सदियाँ बीतीं, और हम क्या देखते हैं? सैकड़ों, हज़ारों निठल्ले,
भ्रष्टाचारी, तन्दुरुस्त आलसी,; जिनसे वे भी नफ़रत करते हैं, जिन्हें समय समय पर
नैतिक, आत्मिक दृष्टि से उनकी ज़रूरत पड़ती है. और यह सब एक – जाति के बहुरुपिया
चिह्नों, हास्यास्पद, धुँधलाते रीति-रिवाजों के बाह्य-आवरण से ढँका रहता है. नहीं,
मैंने मॉन्क्स की बात बेकार ही में नहीं की है, और मैं ख़ुश हूँ कि मेरी उपमा
तर्कसंगत है. सोचिए, सिर्फ इतना सोचिए, कितनी समानता है. वहाँ – चोगा और धूपदानी
है, यहाँ – ट्यूनिक और गरजता हथियार; वहाँ – शांति, कृत्रिम आहें, मीठा भाषण, यहाँ
– बढ़ा चढ़ाकर चित्रित बहादुरी, घमंडी सम्मान, जो पूरे समय आँखों की हलचल से प्रकट
होता है : “और, यदि अचानक कोई मेरा अपमान कर दे तो?” बाहर को निकले सीने, खिंची हुई कोहनियाँ, उठे हुए कंधे. दोनों ही, ये भी, और
वो भी, परजीवी की भाँति जीते हैं और जानते हैं; अपने दिल की गहराई से जानते हैं,
मगर उनकी बुद्धि इसे स्वीकार करने से डरती है, और, ख़ास बात, पेट. और वे मोटी मोटी
जुँओं जैसे हैं, जो दूसरे के शरीर पर जी भर के पलती हैं, जैसे जैसे उसका विघटन
होने लगता है. नज़ान्स्की ने कटुता से नाक से फुत्कार किया और ख़ामोश हो गया.
“बोलिये, बोलिये,” रोमाशोव ने विनती करते हुए कहा.
“हाँ, एक समय आएगा, और वह देहलीज़ पर ही
खड़ा है. समय होगा महान निराशाओं का और भयानक पुनर्मूल्यांकन का. याद रखिए, मैंने
आपसे कभी कहा था कि सदियों से मानवीयता का एक अदृश्य और निर्मम प्रेरणा स्त्रोत
अस्तित्व में है. उसके नियम एकदम सही और क्षमायाचनाओं से परे हैं. और जैसे जैसे
मानवता अधिकाधिक बुद्धिमान होती जाती है, उतनी ही अधिक एवम् गहराई से वह उसमें
पैंठता जाता है. और मुझे विश्वास है कि इन निर्विवाद नियमों
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फ़ज़ान – लंबी और
रंगबिरंगी पूँछ वाला बड़ा पक्षी
के अनुसार दुनिया
की हर चीज़ देर-सबेर संतुलित हो जाएगी. यदि दासता सदियों तक विद्यमान रही तो उसका
विघटन भयानक होगा. अत्याचार जितना भयानक था, उसका प्रतिशोध उतना ही खूनी होगा. और
मुझे गहरा, दृढ़ विश्वास है कि वह समय आयेगा, जब हमारे सर्वविदित ख़ूबसूरत लोगों पर,
ज़बर्दस्त फुसलाने वालों पर, महान छैलों पर महिलाओं को शर्म आने लगेगी और, आख़िरकार,
सिपाही हमारी आज्ञा मानना बन्द कर देंगे. और ऐसा इसलिए नहीं होगा, क्योंकि हमने
ऐसे लोगों को खून निकलने तक मारा, जो स्वयँ को बचाने की संभावना से महरूम थे; और इसलिए
भी नहीं होगा क्योंकि हमें, ट्यूनिक के सम्मान की ख़ातिर, बिना सज़ा पाए औरतों का
अपमान करने का अधिकार था; और न इसलिए होगा कि हम, नशे में धुत होकर, शराबखाने में
हमारे सामने आने वाले हरेक का तलवारों से खीमा बना दिया करते थे. बेशक, इसके लिए
भी, और उसके लिए भी; मगर कहीं ज़्यादा भयानक और न सुधारा जाने वाला अपराध भी है. ये
वो है कि हम – अंधे और बहरे हैं – हर चीज़ के प्रति. बहुत पहले से, हमारी गन्दी,
बदबूदार छावनियों से कहीं दूर; एक विशाल, नए, प्रकाशमान जीवन का निर्माण हो रहा
है. नए, बहादुर, स्वाभिमानी लोग प्रकट हो चुके हैं, उनके मस्तिष्क में जाज्वल्यमान
स्वतंत्रता के विचार धधक रहे हैं. शोकांतिका के अंतिम अंक के समान पुराने बुर्ज और
तहख़ाने ढह रहे हैं और उनके पीछे से, अभी से दिखाई दे रहा है चकाचौंध करने वाला
प्रकाश. और हम, बुरा मुँह बनाए, टर्की जैसे, सिर्फ आँखें झपकाते हैं और धृष्ठता से
गुर्राते हैं, “क्या? कहाँ? ख़ामोश! आंदोलन! गोली मार दूँगा!” और इसी मानवीय आत्मा की आज़ादी के प्रति टर्की जैसे संदेह के लिए हमें कभी माफ़
नहीं किया जाएगा – कभी भी नहीं.”
नौका ख़ामोश,
रहस्यमय पानी के उथले स्थान पर आ गई. उसे चारों ओर से ऊँचे ऊँचे, निश्चल सरकंडों
की गोल, घनी, हरी दीवार ने दबोच लिया. नाव मानो पूरी दुनिया से काट दी गई थी, छिपा
दी गई थी. उसके ऊपर शोर मचाते हुए चिड़िया घूम रही थी; कई बार तो इतने नीचे कि अपने
पंखों से रोमाशोव को छूते हुए, ऐसे कि उसे उनकी शक्तिशाली उड़ान से हवा लगने का
एहसास हो रहा था. शायद, यहाँ, झाड़ियों के भीतर उनके घोंसले थे. नज़ान्स्की सिरे की
तरफ़ चित लेटा था और बड़ी देर तक ऊपर आसमान की ओर देख रहा था, जहाँ सुनहरे, ठहरे हुए
बादल गुलाबी होते जा रहे थे.
रोमाशोव ने सकुचाते
हुए कहा, “आप थके तो नहीं? और कहिए.”
और नज़ान्स्की मानो
अपने विचारों को प्रकट करते हुए बोल पड़ा:
“हाँ, आयेगा नया, विचित्र, महान समय.
मैं तो काफ़ी समय आज़ाद ज़िन्दगी गुज़ार चुका हूँ और काफ़ी कुछ पढ़ा भी है मैंने; काफ़ी
कुछ देखा और बर्दाश्त किया है. अब तक बूढ़े कौए और चिड़िया स्कूल की बेंच से हमें
चोंच मार मार कर कहते थे, ‘अपने निकटतम व्यक्ति से इस तरह प्यार करो जैसे स्वयँ
अपने आप से करते हो, और जान लो कि शराफ़त, आज्ञाकारिता और भय – ये मानव के सबसे
महत्वपूर्ण गुण हैं.’ अधिक ईमानदार, अधिक शक्तिशाली, अधिक हिंस्त्र हमसे कहते, ‘हाथ
थाम कर जाएँगे, आगे बढ़ेंगे, जान दे देंगे; मगर भावी पीढ़ियों के लिए एक साफ़-सुथरी
और आसान ज़िन्दगी बनाएँगे.’ मगर मैं इस बात को कभी भी न समझ पाया. मुझे स्पष्ट
विश्वास से कौन प्रमाणित करके बताएगा, कि मैं इससे किस तरह संबंधित हूँ – शैतान
उसे ले जाए! – मेरे निकटतम व्यक्तियों से, घिनौने गुलाम से, संक्रमक रोगी से,
बेवकूफ़ से? ओह, सभी लोक कथाओं में से मुझे सबसे ज़्यादा नफ़रत है – तहे दिल से,
संदेह के प्रति मेरी समूची सामर्थ्य से – ज्यूलियन मिलोस्तीव वाली लोक कथा से.
महारोग से पीड़ित व्यक्ति कहता है, ‘मैं थरथर काँप रहा हूँ, मेरे बिस्तर में मेरे
साथ लेट जाओ. मैं ठिठुर रहा हूँ, अपने होंठ मेरे बदबूदार मुँह के पास लाकर मुझ पर
साँस छोड़ो.’ ऊफ़, नफ़रत करता हूँ! नफ़रत करता हूँ महारोगियों से और निकटतम लोगों से
प्यार नहीं करता. और फिर, बत्तीसवीं सदी के लोगों की ख़ुशी के लिए अपना सिर फ़ोड़ने
के लिए कौनसा स्वार्थ मुझे मजबूर कर सकता है? ओह, मुझे ये बड़ी बड़ी बातें ख़ूब अच्छी
तरह मालूम हैं: किसी वैश्विक आत्मा के बारे में, किसी पवित्र कर्तव्य के बारे में.
मगर तब भी, जब मेरी बुद्धि इस पर विश्वास करती थी; मेरा दिल इसे मानने के लिए
बिल्कुल भी तैयार नहीं था. आपको मुझ पर ग़ुस्सा आ रहा है, रोमाशोव?”
रोमाशोव ने लजीली
कृतज्ञता से नज़ान्स्की की ओर देखा, “मैं आपको पूरी तरह, पूरी तरह समझ रहा
हूँ,” उसने कहा. “जब मैं न रहूँगा, तो क्या पूरी दुनिया ख़त्म हो जाएगी? आप
यही तो कह रहे हैं ना?”
“ बिल्कुल यही. और, तो, मैं कहता हूँ,
लोगों के दिलों से मानवता के प्रति प्रेम काफ़ूर हो चुका है. उसके स्थान पर आ रहा
है एक नया, स्वर्गीय विश्वास जो दुनिया के अंत तक अमर रहेगा. ये है, अपने आप के
प्रति प्यार, अपने ख़ूबसूरत जिस्म के प्रति, अपनी सबसे बेहतरीन बुद्धि के प्रति,
अपने विचारों की अनंत समृद्धि के प्रति प्यार. नहीं, सोचिए, सोचिए, रोमाशोव: अपने
आप से बढ़कर कोई और अधिक प्यारा, और अधिक निकट है आपके लिए? कोई नहीं. आप – दुनिया
के सम्राट हैं, उसका स्वाभिमान और आभूषण हैं. आप – समूची सजीव सृष्टि के ईश्वर
हैं. हर वह चीज़, जो आप देखते हैं, सुनते हैं, महसूस करते हैं, सिर्फ आपकी है. जो
जी में आए, वही कीजिए. वह सब ले लीजिए जो आपको अच्छा लगता है. पूरी सृष्टि में
किसी से न डरिये, क्योंकि आपसे ऊपर कोई नहीं है, और आपके समान भी कोई नहीं है. वह
समय आएगा, और अपने आप में महान विश्वास प्रकाशित करेगा, पवित्र आत्मा की
अग्निशलाकाओं के समान सब लोगों के सिरों को, और तब न होंगे गुलाम, न स्वामी, न
अपाहिज, न दयनीयता, न पाप, न दुष्टता, न ईर्ष्या. तब लोग ईश्वर बन जाएँगे. और
सोचिए, तब मैं कैसे हिम्मत कर पाऊँगा मानव को अपमानित करने की, उसे धक्का देने की,
उसे धोखा देने की, जिसके भीतर मैं अपने स्वयँ के सदृश्य प्रकाशमान ईश्वर को देखता
हूँ? तब ज़िन्दगी ख़ूबसूरत हो जाएगी. पूरी धरती पर हल्की, प्रकाशित इमारतें खड़ी हो
जाएँगी; कोई बदसूरती, कोई ओछापन हमारी आँखों को अपमानित नहीं करेगा; जीवन एक मीठा
श्रम; आज़ाद विज्ञान; आश्चर्यचकित करने वाला संगीत; प्रसन्न, चिरंतन और हल्का
फुल्का त्यौहार बन जाएगा. प्यार स्वामित्व की जंज़ीरों से आज़ाद, विश्व का प्रकाशमान
धर्म बन जाएगा; न कि रहस्यमय, शर्मनाक – अंधेरे कोने में घृणा से, सावधानी से किया
जाने वाला पाप. और स्वयँ हमारे शरीर हो जाएँगे प्रकाशमान, ताक़तवर और ख़ूबसूरत,
रंगबिरंगे शानदार वस्त्रों में लिपटे. वैसे ही, जैसे मेरे ऊपर स्थित इस शाम के
आकाश में विश्वास करता हूँ,” समारोह पूर्वक हाथ ऊपर को उठाकर
नज़ान्स्की चहका, “उसी तरह दृढ़ विश्वास है मेरा आनेवाली ईश्वर सदृश्य
ज़िन्दगी में!”
रोमाशोव, परेशान,
सकते में आया हुआ, सिर्फ अपने बेरंग होठों को फड़फड़ाने लगा: “ नज़ान्स्की, ये सिर्फ ख़्वाब हैं, कल्पना है!”
नज़ान्स्की नर्मी से
हौले हौले मुस्कुराया, “हाँ,” उसने आवाज़ में मुस्कुराहट लाते हुए कहा, “कोई एक प्रोफ़ेसर कट्टर धर्म का, या क्लासिकल भाषा-शास्त्र का – दोनों पैर
फैलाते हुए, हाथ दूर नचाता है और गर्दन तिरछी करके कहता है: मगर ये है प्रदर्शन
चरम अहंभाव का! बात भयानक शब्दों की नहीं है, मेरे प्यारे बच्चे, बात यह है
कि, दुनिया में उन कल्पनाओं से, जिनके बारे में अब केवल कुछ ही लोग ख़्वाब देखते
हैं, अधिक यथार्थ कोई चीज़ नहीं है. वे – ये कल्पनाएँ – लोगों के लिए सबसे ज़्यादा
विश्वसनीय और उम्मीद से भरपूर कड़ी है. भूल जाएँ कि हम – फ़ौजी हैं. हम – गुलाम हैं.
जैसे, मान लो सड़क पर एक अजीब राक्षस खड़ा है; ख़ुशनुमा, दो सिर वाला राक्षस. जो भी
उसके नज़दीक से गुज़रता है, वह उसके चेहरे पर मारता है, फ़ौरन चेहरे पर मारता है.
उसने अभी तक मुझे नहीं मारा है; मगर सिर्फ ये ख़याल कि वह मुझे मार सकता है, मेरी
प्रिय औरत को अपमानित कर सकता है, तानाशाही से मेरी आज़ादी छीन लेता है, - ये ख़याल
मेरे सारे अभिमान को झकझोर देता है. मैं अकेला उस पर क़ाबू नहीं पा सकता. मगर मेरी
बगल में वैसा ही बहादुर और वैसा ही स्वाभिमानी व्यक्ति खड़ा है, जैसा कि मैं हूँ;
और मैं उससे कहता हूँ: ‘ चलें, दोनों मिलकर कुछ ऐसा करे कि वह न तुम्हें, न मुझे
मारे’, और हम चल पड़ते हैं. ओह, यह, बेशक, एक फूहड़ उदाहरण है, ये एक ख़ाका है, मगर
इस दो सिर वाले राक्षस के रूप में मैं वह सब देखता हूँ जो मेरी रूह को बाँध देता
है, मेरी आज़ादी पर अत्याचार करता है, अपने व्यक्तित्व के प्रति मेरे सम्मान को
छोटा कर देता है. और तब न तो निकटतम व्यक्ति के लिए शारीरिक सहानुभूति, बल्कि
स्वयँ के प्रति दैविक प्रेम ही मेरे प्रयत्नों को औरों के प्रयत्नों से जोड़ता है,
ऐसे लोगों से जिनकी आत्मा मेरे ही समान है.”
नज़ान्स्की चुप हो
गया. ज़ाहिर था कि ये बेआदतन मानसिक उत्तेजना उसे थका गई थी. कुछ मिनटों के पश्चात्
उसने सुस्ती से आगे कहा, मरी मरी आवाज़ में: “तो ये बात है, मेरे प्यारे गिओर्गी अलेक्सेयेविच. हमारे निकट से तैर रही है
विशाल, उलझी हुई, खदखदाती ज़िन्दगी; पैदा हो रहे हैं दैविक, सुलगते विचार, नष्ट हो
रही हैं पुरानी सुनहरी मूर्तियाँ. और हम खड़े हैं हमारे अस्तबलों में, कमर पर हाथ
रखे, और गरज रहे हैं: “आह, तुम, बेवकूफ़! गुलाम! मा---रूँगा
तुझे!” और ज़िन्दगी इस बात के लिए हमें कभी माफ़ नहीं करेगी...”
वह कुछ उठा, अपने
कोट के नीचे सिकुड़ गया और थकान से बोला, “ठंड है...घर जाएँगे...”
रोमाशोव ने सरकंड़ों
के जाल से नाव बाहर निकाली. सूरज शहर की छतों के पीछे डूब रहा था, और वे गहराते
हुए और स्पष्टता से संध्या प्रकाश के लाल पट्टे में उभर कर नज़र आ रही थीं. कहीं
कहीं खिड़कियों के शीशों से परावर्तित होकर प्रकाश की लपटें खेल रही थीं. संध्या प्रकाश
की ओर का पानी गुलाबी था, चिकना और प्रसन्न था; मगर नाव के पीछे वह घना हो रहा था,
नीला पड़ रहा था और सलवटें डाल रहा था.
रोमाशोव ने अचानक
कहा, अपने ख़यालों के जवाब में: “आप सही कह रहे हैं. मैं रिज़र्व में
चला जाऊँगा. ख़ुद भी नहीं जानता कि ये कैसे करूँगा, मगर मैं पहले भी इस बारे में
सोचता था.”
नज़ान्स्की कोट में
दुबक रहा था और ठंड से काँप रहा था.
“जाईये, जाईये,” उसने प्यार भरे दुख से कहा. “आपके भीतर कुछ है, कोई आंतरिक
प्रकाश...मैं नहीं जानता कि उसे क्या कहते हैं. मगर हमारी माँद में उसे बुझा दिया
जाएगा. सिर्फ थूकेंगे उस पर और बुझा देंगे. ख़ास बात – आप डरिए नहीं, ज़िन्दगी से
डरिए नहीं: वह बड़ी ख़ुशनुमा, दिलचस्प, आश्चर्यजनक चीज़ है – ये ज़िन्दगी. और, कोई बात
नहीं, अगर आपकी बात नहीं बनती है – आप गिरने लगते हैं, मारे मारे फिरने की नौबत
आती है, नशे में धुत पड़े रहते हैं. मगर फिर भी, हे भगवान, मेरे अपने, कोई भी आवारा
दस हज़ार गुना ज़्यादा पूरी पूरी और ज़्यादा दिलचस्पी ज़िन्दगी जीता है, आदम ईवानिच
ज़ेर्ग्झ्त या कैप्टेन स्लीवा के मुक़ाबले में. धरती पर इधर उधर घूमते हो, विभिन्न
शहर देखते हो, गाँव देखते हो, कई सारे विचित्र, ग़ैर ज़िम्मेदार, हास्यास्पद लोगों
से मिलते हो, देखते हो, सूँघते हो, सोते हो ओस गिरी घास पर, बर्फ में ठिठुरते हो,
किसी भी चीज़ से बंधे नहीं हो, किसी से डरते नहीं हो, रूह के हर कण से आज़ाद ज़िन्दगी
का लुत्फ उठाते हो...ऐह, लोग आमतौर से कितना कम समझते हैं! ...
क्या सब एक ही नहीं है: कैस्पियन की छोटी
मछली या जंगली बकरे का माँस खाना; मशरूम के साथ, वोद्का पीना अथवा शैम्पेन पीना;
सिंहासन पर मरना या पुलिस चौकी में. ये सारे विवरण, छोटी छोटी सुविधाएँ, जल्दी से
ख़त्म होने वाली आदतें हैं. वे सिर्फ ग्रहण लगाती हैं; सस्ता बनाती हैं जीवन के
सबसे प्रमुख और विशाल सार को. मैं अक्सर देखता हूँ शानदार जनाजों को. चाँदी की
पेटी में बेमतलब की सजावट के नीचे एक जर्जर, मुर्दा बूढ़ा बन्दर; और अन्य ज़िन्दा
बन्दर उसके पीछे पीछे चलते हैं; थोबड़े खींचे, अपने आप पर और अपने आगे और पीछे
हास्यास्पद सितारे और घुंघरू...और ये सारे भाषण, मीटिंग्स, विज़िट्स...नहीं, मेरे
अपने, सिर्फ एक ही निर्विवाद, ख़ूबसूरत और अपरिहार्य चीज़ है – आज़ाद रूह; और इसके
साथ साथ सृजनात्मक विचार और जीवन की आनन्दमय प्यास. मशरूम हो भी सकते हैं, नहीं भी
– ये बड़ा बेढंगा, तीखा और चिड़चिड़ाहटभरा खेल है परिस्थिति का. एक गार्ड भी, यदि वह
एकदम बेवकूफ़ न हो, तो एक साल बाद अच्छी तरह पढ़ लिख जाएगा और भली भाँति राज कर
सकेगा. मगर एक खिला खिला कर मोटा किया गया अकड़ू और मंदबुद्धि बन्दर, जो एक गाड़ी
में बैठा है, चर्बी चढ़े पेट पर बहुमूल्य पत्थर चढ़ाए, आज़ादी की स्वाभिमानपूर्ण
आकर्षक शान को नहीं समझ सकता; प्रेरणा के आनन्द को महसूस नहीं कर सकता; उत्साह के
मीठे आँसू नहीं बहा सकता – यह देखकर कि विलो वृक्ष की टहनी पर कैसे फूली फूली
टोपियाँ झिलमिला रही हैं!”
नज़ान्स्की खाँसने लगा और देर तक खाँसता
रहा. फिर नाव से बाहर थूक कर आगे बोला:
“चले जाओ, रोमाशोव. तुमसे ऐसा इसलिए कह
रहा हूँ, क्योंकि मैंने ख़ुद भी आज़ादी का लुत्फ़ उठाया है; और अगर मैं वापस आया, इस
ज़हरीले पिंजरे में, तो इसकी वजह ये थी...ख़ैर, जाने दो...एक ही बात है, आप समझ रहे
हैं. निडरता से ज़िन्दगी में कूद पड़िये, वो आपको धोखा नहीं देगी. वो एक विशाल इमारत
है, हज़ारों कमरों वाली, जिनमें रोशनी, ख़ूबसूरत तस्वीरें, ज़हीन, सलीक़ेदार आदमी;
हँसी, नृत्य, प्यार – वह सब, जो महान और भव्य है कला के क्षेत्र में. और आपने अब
तक इस महल में सिर्फ एक अंधेरी, तंग कोठरी ही देखी है, कूड़ा-करकट और मकड़ जालों
वाली – और आप उससे बाहर निकलने में डरते हैं.”
रोमाशोव नौका को किनारे तक ले आया और
उसने नज़ान्स्की की नाव से उतरने में मदद की. अँधेरा हो गया था जब वे नज़ान्स्की के
कमरे में वापस आए. रोमाशोव ने अपने साथी को पलंग पर लिटाया और ऊपर से कंबल और
ओवरकोट से ढाँक दिया.
नज़ान्स्की इतनी बुरी तरह काँप रहा था कि
उसके दाँत किटकिटा रहे थे. एक गठरी जैसा सिमट कर और सिर को तकिए में घुसा कर वह
बड़ी दयनीय, असहाय, बच्चों जैसी आवाज़ में बोला:
“ओह, कितना डर लगता है मुझे अपने कमरे
में...कैसे सपने; कैसे कैसे सपने!”
“आप चाहें तो मैं रात में यहीं रुक जाऊँ?” रोमाशोव ने कहा.
“नहीं, नहीं, ज़रूरत नहीं है. कृपया
ब्रोमाइड़ मंगवा दीजिए...और...थोड़ी वोद्का भी. मेरे पास पैसे नहीं हैं...”
रोमाशोव उसके पास ग्यारह बजे तक बैठा
रहा. धीरे धीरे नज़ान्स्की की कंपकंपाहट कम हुई. उसने अचानक अपनी बड़ी बड़ी, चमकीली,
उत्तेजित आँखें खोलीं और निर्णयात्मक लहज़े में रुक रुक कर कहा, “अब जाईये. अलबिदा.”
“अलबिदा,” रोमाशोव ने दयनीयता से कहा.
उसका दिल चाह रहा था कि कहे, “अलबिदा, उस्ताद,” मगर वह शर्मा गया और कुछ मज़ाहिया अंदाज़ में आगे बोला, “ ‘अलबिदा’ क्यों? ‘द स्विदानिया (अगली
मुलाक़ात तक)’ क्यों नहीं?”
नज़ान्स्की हँस पड़ा, बोझिल, बेमतलब,
अप्रत्याशित हँसी थी ये.
“और ‘ द स्विश्वेत्सिया’ क्यों नहीं?” वह पागलों जैसी जंगली आवाज़ में
चिल्लाया.
और रोमाशोव को अपने पूरे शरीर में भय की
थरथराती लहरों का अनुभव हुआ.
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यहाँ दस्विदानिया-
का वास्तविक अर्थ तो है, फिर मिलेंगे, मगर दस्विश्वेत्सिया में श्वेत्सिया से तात्पर्य है – घटना से.